6/18/2020

मुंबई में एक मौत, स्टारडम की ब्रांडिंग और ट्रोल आर्मी


विनीत उत्पल
प्रसिद्ध कमलेश्वर की एक कहानी है ‘दिल्ली में एक मौत’. इसमें एक व्यक्ति की मौत पर उसके अंतिम संस्कार में जो लोग आते हैं, उन्हें मरने वाले से मतलब नहीं था बल्कि वे मौके पर पहुंचकर अपना पीआर बढाने में जुटे होते हैं. वैसे ही सुशांत सिंह राजपूत की मौत पर बॉलीवुड सितारों का रवैया दिखा. उनके जो निकट मित्र रहे, वे सदमें में हैं और गम में डूबे हुए हैं. अंतिम संस्कार में उनके पारिवारिक सदस्यों के अलावा, अभिनेत्री कृति सेनन, श्रद्धाकपूररिया चक्रवर्ती, अभिनेता विवेक ओबेरॉय, रणदीप हुड्डा, कांग्रेस नेता संजय निरुपम, निर्देशक अभिषेक कपूर, सुनील शेट्टी, राजकुमार राव, वरुण शर्मा आदि मौजूद रहे। 

वहीं, सुशांत सिंह राजपूत के नाम को भुनाने वाले या तो उससे अपनी नजदीकी या फिर अपनी समस्या को उसके सर मढ़कर भरपूर तौर पर भुनाने की कोशिश की. जिस तरह मीडिया में छाने के लिए बॉलीवुड स्टार पक्ष में या विपक्ष में अनाप-शनाप बयान देकर मीडिया में सुर्खियां पाई, राष्ट्रीय न्यूज मीडिया ने भी दी दिन तक इस मामले को भरपूर तूल दी. यह मुंबई में हुई एक मौत पर स्टारडम की ब्रांडिंग का एक नमूना है. दिलचस्प है कि जब बॉलीवुड की तथाकथित नामचीन हस्तियों के नाम सामने आने लगे तो तमाम न्यूज चैनल ने सुशांत सिंह राजपूत की खबर को गायब ही कर दिया. 
सुशांत सिंह राजपूत की मौत के बाद जिस तरह से बॉलीवुड और मीडिया में कोहराम मचा, वह फ़िल्मी दुनिया की कार्यप्रणाली पर अलग तरह से सोचने को विवश करता है. कंगना रनौत ने भाई-भतीजे का आरोप लगाया. शेखर कपूर ने कहा कि मैं उसके दर्द को समझ सकता हूं. निखिल द्विवेदी ने भी निशाना साधते हुए कहा फिल्म इंडस्ट्री का दिखावा मुझे शर्मिंदा करता है. जाहिर-सी बात है कि बॉलीवुड इस मौत के मामले में दो भागों में बंटा और हर कोई अपने-अपने नजर से सुशांत की मौत को आंकलन किया. सुशांत की मानसिक परेशानी यानी डिप्रेशन, फिल्मों का न मिलना, गिरते करियर ग्राफ आदि को लेकर तमाम बातें बॉलीवुड हलके में कही गई. यहां तक कि कुछ लोग कमाल खान की बातों को आधार बनाकर ऑनलाइन हस्ताक्षर अभियान भी चलाया और भारतीय सिनेमा में नेपोटिज्म (भाई-भतीजावाद) के विरोध में खड़े हुए. इसके तहत नेटफ्लिक्स, अमेज़न प्राइम और हॉट स्टार जैसे लोकप्रिय स्ट्रीमिंग कंपनियों से पूछा गया कि कुछ ख़ास मीडिया घरानों की फिल्मों को अपने यहां प्रोमोट की प्रक्रिया को तुरंत प्रभाव से रोकें. उनका मानना रहा कि ये मीडिया घराने फिल्म नहीं बनाते वरन प्रख्यात फ़िल्मी कलाकार के बच्चों को लांच करते हैं और इस तरह फ़िल्मी दुनिया में भाई-भतीजावाद फैलाते हैं.
राष्ट्रीय मीडिया सहित फ़िल्मी हलकों में यह बात साफ़ तौर पर कही जा रही है कि करण जौहर, सलमान खान, भट्ट परिवार, कपूर फैमिली, यशराज फिल्म्स, भंसाली, सहित तमाम लोग उस एलीट गैंग के सदस्य हैं और इनकी छत्रछाया के बिना किसी बाहरी लोगों को काम नहीं मिल सकता है. दिलचस्प है कि फिल्म बनाने के मामले में भारत दुनिया के दूसरे नंबर पर है लेकिन इसका नियंत्रण सिर्फ और सिर्फ आधे दर्जन लोगों के पास है. इस मामले में सत्यता इसलिए भी दिखती है क्योंकि सुशांत सिंह राजपूत की फिल्म ‘सोनचरैया’ जब रिलीज हुई तब उसने अपने इंस्टाग्राम पर लिखा था, ‘बॉलीवुड में मेरा कोई गॉडफादर नहीं है और यदि आप मेरी फ़िल्में नहीं देखेंगे तो मैं यहां से बाहर हो जाऊंगा.’ हालांकि कांग्रेस नेता संजय सिंह निरुपम ने आरोप लगाया था कि मुंबई ने दबंग मीडिया घरानों के दबाव में उनसे सात फ़िल्में वापस ले ली गईं.
मुंबई की मीडिया के कारस्तानी दिलचस्प है जिसके तहत सुशांत सिंह राजपूत के खास मित्रों को टारगेट किया गया और उन्हें सोशल मीडया के तमाम प्लेटफोर्म पर ट्रोल भी किया गया और कहा गया कि उनके खास लोगों ने उनकी मृत्यु पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी. यही कारण है कि सुशांत के मित्र और अभिनेत्री कृति सेनन को अपने इनस्टाग्राम पर लिखना पड़ा, "कुछ मीडियाकर्मी अपनी संवेदनशीलता पूरी तरह से खो चुके हैं. ऐसे समय में वह आपसे लाइव आकर कमेंट करने की गुजारिश करते हैं. अंतिम संस्कार में जाते वक्त साफ तस्वीर क्लिक करने के लिए कार का दरवाजा ठोकना और बोलना कि मैडम शीशा नीचे करो न. अंतिम संस्कार पर्सनल होते हैं. इंसानियत को काम से ऊपर रखें. हम भी साधारण इंसान हैं और हमारी भी कुछ भावनाएं हैं. यह मत भूलो." वहीं ट्रोल करने वालों को लेकर भी कृति सेनन ने कहा, यह बहुत ही विचित्र है कि ट्रोल और गॉसिप करने वाले लोग अचानक जागे और आपकी अच्छाईयों के बारे में बात करने लग जाए जब आप इस दुनिया में नहीं है. सोशल मीडिया सबसे फेक और जहरीली जगह है. यदि आपने पब्लिकली कुछ नहीं लिखा और आरआईपी पोस्ट नहीं किया तो समझ लिया जाता है कि आपको दुख नहीं है, जबकि रियलिटी में यही लोग सबसे ज्यादा दुखी होते हैं. ऐसा लगता है कि सोशल मीडिया रियल दुनिया है और रियल दुनिया फेक समझी जाने लगी है."
कृति सेनन की छोटी बहन नुपुर सेनन ने लिखा कि हर कोई सुशांत की मानसिक स्वास्थ्य को लेकर लिखने लगा और हम जैसे लोगों को लेकर ट्विटर पर लिखने लगा, सन्देश भेजने लगा कि आप लोगों ने इंस्टाग्राम पर उसकी मृत्यु पर कुछ नहीं लिखा. “एक पोस्ट तक नहीं डाला”. “तुम लोगों ने एक रिएक्शन नहीं दिया, कितने पत्थर दिल हो तुम.” नुपुर आगे सवाल करती हैं कि आप की परमिशन हो तो सुकून से रो सकते हैं? प्लीज. क्या स्वस्फूर्त या किसी के मातहत कार्य कर रहे ट्रोलआर्मी का यही काम है कि वह किसी की मौत में एक मौका तलाशे और ट्रोल करे? हालांकि अभिनेत्री श्रद्धा कपूर, अंकिता लोखंडे और रिया चक्रवर्ती ने लोगों के ट्रोल करने के बाद भी खामोशी बरती और अपने गम को छुपाती रही हैं.  
बहरहाल, सवाल यह है कि किसी के मरने पर मीडिया सिद्धांत या फिर मीडिया नैतिकता क्या कहता है? क्या किसी के मरने को एक तमाशा बना दिया जाय और उससे जुड़े उन लोगों की प्रतिक्रिया मांगी जाय जो उससे सीधे जुड़े हैं और गम में हैं? सवाल मनुष्य की नैतिकता की भी है कि मरने पर अपनी पब्लिशिटी के लिए मृतक बड़े-बड़े लेख लिखें, टीवी पर आयें और किसी के स्टारडम को भुना लें, जब तक कि कोई दूसरे मामले सुर्खियां न बन जाय.   

6/14/2020

भारतीय मीडिया, भारतीय सीमा और रिपोर्टिंग

विनीत उत्पल
टेलीविजन मीडिया जिस तरह से देश की सीमाओं को लेकर ख़बरें दिखा रहा है, इस पर विचार करना आवश्यक है कि किस राह पर भारत की मीडिया इंडस्ट्री जा रही है. प्राइम टाइम की ख़बरों पर नजर डालें तो ऐसा लगता है कि भारत एक ऐसा देश है जो पाकिस्तान, चीन और नेपाल के साथ लगातार सीमा विवादों और सैन्य मुकाबलों की ओर बढ़ रहा है. मीडिया की ख़बरों में दिखता है कि भारतीय सेना ने पाकिस्तान के बंकरों को तबाह कर दिया तो चीन की सेना को घुटने टेकने के लिए मजबूर कर दिया. दिलचस्प है कि पिछले कुछ दशकों में अमेरिकी-चीन के शीत युद्ध में हर बार चीन भारी पड़ा है, ऐसे में भारतीय मीडिया की हेडलाइन भारतीय सेना के कारनामे को भी कठघरे में भी खड़े करती है.

मीडिया पैनल में देश के तमाम रक्षा विशेषज्ञ भारत-चीन, भारत-पाकिस्तान और भारत-नेपाल को लेकर अपने विचार प्रकट कर रहे हैं, जैसे लगता है वे ही सीमा क्षेत्र की वास्तविकता से अवगत हैं और कोई नहीं. उनका गुस्सा करने के नाटक देखने लायक होता है और तमाम नौटंकी उस खबर के आधार पर होती है जिसे न तो कोई पुख्ता किया होता है और न ही उसका वास्तविक आधार होता है. इस विषय में किसी भी किसी देश का अधिकारिक बयान नहीं होता, बल्कि भारत हो या चीन या पाकिस्तान की मीडिया की ख़बरें होती हैं. सेना के तमाम पूर्व अधिकारी वर्तमान हालातों को छोड़कर अतीत की बातों को ज्यादा तवज्जो दे रहे हैं. भारत के कब-कब और किस-किस इलाके में पाकिस्तान और चीन को हराया जैसे मामले को रेख्नाकित कर रहे हैं और वर्तमान स्थिति को लेकर उनका ज्ञान न्यूनतम होता है.
कभी कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने मजाक में ही कहा था कि चाय बेचने वाला चाय ही बेच सकता है, सरकार नहीं. परिस्थितियां बदली और चाय वाला पिछले छह वर्षों से देश चला रहा है, चाय नहीं बेच रहा. जाहिर है, तमाम लोगों और देशों की स्थितियां बदलती है और समाज आगे बढ़ता है. ऐसे में क्या इस बात के इनकार किया जा सकता है कि किसी देश के साथ भारत की लड़ाई के इतने वर्षों बाद क्या भारत सहित उसके पड़ोसी देशों ने अपनी सेना को सशक्त बनाने के लिए कुछ नहीं किया होगा. कहा जाता है कि कभी भी किसी दुश्मन को कम नहीं आंकना चाहिए. मगर, भारतीय मीडिया जिस तरह के भारत की तस्वीर दर्शकों के सामने रख रख रही है, ऐसा लगता है कि दुनिया के सबसे वीर और क्रूर सेना में भारतीय सेना शामिल है. जबकि वस्तविकता यह है कि भारत की कूटनीतिक रणनीति रही है कि वह कभी भी किसी देश पर आगे बढ़कर हमला नहीं किया है.  

आज की भारतीय टीवी मीडिया पाकिस्तान, चीन और नेपाल को भारत के सबसे बड़े दुश्मन के तौर पर पेश कर रही है, जबकि स्थिति यह है कि पड़ोसी देशों के साथ भारत के व्यापारिक और सांस्कृतिक संबंध काफी तगड़े रहे हैं. आज भी भारत की काफी संख्या में भारत और पाकिस्तान के लोगों की शादियां एक-दूसरे के यहां होती हैं और उर्स के मौके पर एक-दूसरे के यहां आते हैं. भारत और नेपाल के बीच ‘रोटी-बेटी’ का रिश्ता माना जाता है और उस मर्यादापुरुषोत्तम राम का ससुराल नेपाल के जनकपुर में है, जिनका कद आस्था के मामले में सबसे बड़ा है. भारत में पैदा हुआ बौद्ध धर्म मानने वालों की संख्या चीन में अधिक है और चीन के लोग गौतम बुद्ध से जुड़े स्थानों पर भ्रमण करने हर वर्ष काफी संख्या में आते हैं.
भारतीय टेलीविजन मीडिया की हालत ऐसी है कि सिर्फ और सिर्फ उसके पोस्टर बॉय यानी एंकर की सर्वज्ञाता है. वह स्टूडियो में बैठकर ख़बरों का विश्लेषण करेगा और फिर फील्ड में जाकर रिपोर्टिंग भी. आज के टीवी एंकर जिस तरह के अपने पैनल पर आने वाले गेस्ट पर या किसी विषय पर चिल्लाते हैं, क्या यही एंकर या पत्रकार का गुण है? यदि सरकार के सकारात्मक कार्यों को सामने रखने का कार्य का है तो नकारात्मक कार्यों को लेकर सरकार से पूछने की जिम्मेदारी भी पत्रकार की ही है. परदे के पीछे के संवाददाता क्या करते हैं, कोई नहीं जानता. एक विश्लेषण करें तो पाएंगे कि किसी भी टीवी चैनल के कितने रिपोर्टर सीमा के इलाके में लगातार रहकर रिपोर्टिंग कर रहे हैं, तो प्रिंट मीडिया को छोड़ दें तो संख्या सिफर मिलेगी. टीवी रिपोर्टर कश्मीर, जम्मू, अहमदाबाद, चंडीगढ़ या दिल्ली जैसी जगहों में रहकर सीमा पर हो रही हलचलों की जानकारी देता है. ज्यादा हुआ तो किसी व्यक्ति के ट्विटर, फेसबुक जैसे सोशल मीडिया पर पोस्ट किये गए विडियो को अपनी खबरों से जोड़कर न्यूज पैकज में तमाम चैनल पेश करते हैं.
सीमा रेखा और वहां पर हो रहे विवाद को लेकर मीडिया संस्थानों और सरकार को गंभीरता बरतने की आवश्यकता है. देश में तमाम पत्रकारिता प्रशिक्षण संस्थान संचालित हो रहे हैं लेकिन आज तक कहीं भी ‘पीस जर्नलिज्म’, ‘वॉर जर्नलिज्म’, ‘कनफ्लिक्ट जर्नलिज्म’ आदि से जुड़े न तो कोई कोर्स ही सामने आये और न ही किसी मीडिया संस्थानों का ध्यान ही गया कि अपने पत्रकारों को वे प्रशिक्षित करें. क्राइम बीट देखने वाला पत्रकार ही लोकल क्राइम की ख़बरों को कवर करेगा, वही, दंगा-फसाद को लोकर, वही नेशनल क्राइम को भी, वही दाउद इब्राहीम को भी, वही कश्मीर और पंजाब में पकड़े गए आतंकवादियों को लेकर तो वही इंटरनेशनल क्राइम की भी रिपोर्ट करेगा. हालात यह कि देश में कायदे से अपराध पत्रकारिता का भी प्रशिक्षण भी किसी को नहीं दिया जाता है. यदि अमेरिकी सरकार को रक्षा तंत्र पेंटागन सहित तमाम संस्थानों को देखें तो पाएंगे कि वहां किस-किस तरह के पत्रकारों को रिपोर्टिंग के लिए प्रशिक्षित किया जाता है. भारत में स्थिति इसके उलट है, यहां के पत्रकार जब नौकरी में आते हैं, तो उनके समुचित और निरंतर प्रशिक्षण की कोई सटीक योजना किसी भी संस्थान के पास नहीं होती. अंतरराष्ट्रीय मामलों में किसी अन्य संस्थानों से कोई समझौता नहीं होता, जिसे एक-दूसरे के यहाँ के पत्रकारों को प्रशिक्षण मिल सके. कोई विदेशी भाषा सीखने के लिए मीडिया संस्थान अपने पत्रकारों को प्रोत्साहित नहीं करते, जिससे विपरीत परिस्थिति आने पर विदेशी की खबरों को प्रसारित या प्रकाशित करने में आसानी हो. भारतीय पत्रकार तमाम समय में अपनी नौकरी बचाने की जुगाड़ में लगे रहते हैं क्योंकि प्रबंधन इतना प्रभावी हो चुका है, कि कौन पत्रकार, कौन संपादक की नौकरी कब चली जाय, कोई नहीं जानता, तो ऐसे में वह अपनी काबिलियत किस तरह बढ़ाएगा, यह अहम सवाल है.       

1/07/2020

साक्षात्कार

साक्षात्कार
-आप हिंदी से एमए नहीं हैं, इसलिए मीडिया के छात्रों को नहीं पढा सकते।
-मैं पत्रकारिता और जनसंचार से मास्टर किया है। दस वर्ष हिंदी पत्रकारिता की है। वह भी राष्ट्रीय अखबारों में। और विभिन्न संस्थानों में पत्रकारिता पढा भी रहा हूं।
-यह हिंदी विभाग है, इसलिए हिंदी में मास्टर तो होने चाहिए।
-लेकिन विज्ञापन में तो ऐसी अनिवार्य योग्यता तो लिखी नहीं थी।
-तो आप ऐसा करिये एचआरएस (हिंदी रिलीजन स्टडी) पढा दीजिये। उसी के लिए हम आपको रख सकते हैं।
-मैं हिंदू धर्म को जानता ही कितना हूं? उतना ही जानता हूं जितना पारंपरिक तौर पर मेरे घर में पूजा-पाठ होता है।
-फिर आपको हम नहीं रख सकते?
- क्यों?
-आप इन्हें समझा दीजिये कि इनका चयन क्यों नहीं हो सकता
(बगल में बैठे शख्स की ओर देखते हुए)।
#अभ्यर्थी की डायरी

1/06/2020

छात्र, राजनीति और तोहफे

सेकेंगे रोटियां राजनीति की
चाहे वह सत्ता में हो या सड़क पर
लगाएंगे आरोप
और लगेगा प्रत्यारोप
हर व्यक्ति कठघरे में होगा
जो होगा सड़क पर
मगर इस अच्छे और बुरे दिन की सुबह में
सत्ता की मलाई खाने को आतुर
तमाम राजनेता, अभिनेता और पत्रकार
भौंकते रहेंगे टीवी और सोशल मीडिया जैसे भोंपू पर
क्या बोलेंगे, क्या लिखेंगे
और क्या मीडिया में दिखाएंगे
टीआरपी और पब्लिसिटी के लिए
क्या हथकंडे अपनांएंगे
कोई नहीं जानता
मगर यह सत्य है कि
छात्रों की बेचैनी
छात्रों का प्रदर्शन
छात्रों का दमन
छात्रों का ज्ञान
छात्रों का अज्ञान
छात्रों की मौत
हर किसी के लिए तोहफे लाएंगे
क्योंकि
कोई सड़क छाप लोफर बन जाएगा मसीहा
बन जाएगा विधायक या सांसद
किसी को मिल जाएगी
टूटी सरकारी बिल्डिंग या सड़क बनाने का ठेका
कोई नेता शीर्षस्थ होगा सत्ता पर
मंत्री पद से होगा सुशोभित
किसी पत्रकार को मिलेगा पुरस्कार
या किसी गवर्निंग बॉडी का बन जाएगा मेंबर
या फिर किसी मंत्री-मुख्यमंत्री का बनेगा मीडिया एडवाइजर
समय वही रहेगा,लोग वही रहेंगे
मुद्दे नये उभरेंगे, पुराने मुद्दे बिसुरे जाएंगे
बदल जाएगा निजाम का जिस्म
बदल जाएंगे सड़क के मुसाफिर
कर्म का योद्धा जीतेगा दुनिया
जो फिसलेंगे, उठने में लगेंगी सदियां
बावजूद इसके,
छात्र वहीं रहेंगे
कॉलेजों में, पुस्तकालयों में
पढाई के बाद करते रहेंगे विचार-विमर्श
उठाते रहेंगे विद्रोह की आवाज
करते रहेंगे प्रदर्शन
खाते रहेंगे डंडे
गोलियां और आंसू गैस के गोले
दुनिया की तमाम सड़कों पर
ऐसे में चूंकि मेरे सपने हैं बड़े
इसलिए मैं सोता रहूंगा
इस भयंकर ठंढ में
रजाई तान कर तब तक
जब तक कि कोई बम का गोला
रोशनदान से गिरकर
फट न जाए मेरे बिस्तर पर
और मेरे जिस्म के हो न जाएं चिथड़े।
-विनीत उत्पल
18.12.2019

5/14/2019

चुनावी संचार रणनीति और वैचारिक वर्ग मॉडल


चुनाव की रणनीति में संचार मॉडल की अहम भूमिका होती है. हर राजनीतिक दल एक-दूसरे पर आक्षेप लगाते हैं, खुद को सबसे बेहतर और दूसरे को नीचा दिखाते हैं. ऐसे में संचार के उस मॉडल को समझना आवश्यक है जिसके तहत चुनावी लड़ाई लड़ी जाती है. सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में चुनावी रणनीति में बड़े-से-बड़े धुरंधर अपना जी-जान लगाते हैं और तमाम रणनीति के साथ तिकड़म भी अपनाते हैं. वोट बैंक की ध्रुवीकरण की रणनीति के अपने मायने होते हैं और कौन नेता किस तरह जनता को अपने पक्ष में करता है और अपने पक्ष में ही वोट डालने के लिए मजबूर करता है, महत्वपूर्ण होता है.

ऐसे में महान संचारविद वैन डीजेक का वैचारिक वर्ग मॉडल काफी मायने रखता है, जिसके तहत करीब एक दशक पहले कहा गया कि मतदाताओं के ध्रुवीकरण के लिए ‘सकारात्मक आत्म-प्रतिनिधित्व’ और ‘नकारात्मक अन्य-प्रतिनिधित्व’ जैसी संकल्पना काफी मायने रखती हैं. जाहिर सी बात है कि वैचारिक वर्ग मॉडल के तहत सैद्धांतिक लड़ाई में ‘स्व’ और ‘अन्य’ का भेदभाव काफी मायने रखता है. चुनावी रैली में ‘स्व’ बनाम ‘अन्य’ का संघर्ष अहमियत रखता है, जिसके तहत वक्ता अपने समूह को अपना और विरोधियों के समूह को बाहरी समूह के तौर पर प्रचारित करता है. वैचारिक वर्ग मॉडल के अनुसार, वक्ता खुद को सकारात्मक तौर पर जनता के सामने पेश करता है, वहीं, प्रतिद्वंद्वी को नकारात्मक तौर पर दिखाता है. इस प्रस्तुतीकरण में वक्ता जहाँ हमेशा अपनी सकारात्मक छवियों को प्रदर्शित करता है, वहीं दूसरी की नकारात्मक छवियों को जनता के सामने जोरदार ढंग से सामने रखता है.
वैन डीजेक ने अपने मॉडल के तहत स्थूल (मैक्रो) विश्लेषण और सूक्ष्म (माइक्रो) विश्लेषण करने की सलाह दी थी. स्थूल विश्लेषण के तहत उनका मानना है कि खुद को उपर और दूसरों को नीचा दिखाने में चार तरह की रणनीति अपनाई जाती है, मसलन खुद की सकारात्मक चीजों पर जोर दें, दूसरों की नकारात्मक चीजों के बारे में लोगों को गहरे तौर पर बताएं, अपने से जुड़ी नकारात्मक बातों को हावी न होने दें और दूसरों की सकारात्मक बातों को भी हावी न होने दें. 
वैचारिक वर्ग मॉडल के तहत वैन डीजेक ने कुल 25 ऐसे बीज तत्वों की चर्चा की है जिसके तहत चुनाव के दौरान संचार की रणनीति अपनाई जाती है. 
मसलन, ‘पहला नेतृत्व का विवरण’, यानी दोनों पक्ष अपने-अपने नेता की बड़ाई और दूसरे पक्ष के नेता की बुराई करता है. दूसरा ‘अथॉरिटी’ यानी ऐसे प्रभावशाली वर्गों के सहायता ली जाती है जो जो उनके दावे का समर्थन करें. ये प्रभावशाली वर्ग कोई संस्थान या व्यक्ति कोई भी हो सकता है और उसे आदर्श के तौर पर समाज में देखा जाता है. इनमें धार्मिक नेता, विशेषज्ञ, अंतर्राष्ट्रीय संस्था, स्कॉलर, मीडिया, अदालत आदि शामिल हैं. तीसरा ‘बोझ’, यानी इसके तहत जनता के सामने यह बात प्रदर्शित की जाती है कि अमुक समूह के कारण देश या समाज को मानवीय या आर्थिक हानि हुई और समूह को निशाना बनाये जाने से लक्षित समूह की भावना को आसानी से प्रभावित किया जा सकता है. चौथा, वर्गीकरण, यानी इसके जरिये राजनीति  दलों और समाज के लोगों ओ अलग-अलग भागों में धार्मिक और राजनीति के आधार पर बांटा जाता है या बंटने के लिए मजबूर किया जाता है. पांचवां, ‘तुलना’ यानी  दो लोग (नामदार और कामदार), समूह, स्थान, वस्तुओं के बीच समानता और अंतर को प्रदर्शित किया जाता है. आतंरिक समूह हमेशा सकारात्मक पहलुओं को लोगों के सामने रखता है, वहीं बाहरी समूह के बारे में नकारात्मक बातों को प्रदर्शित करता है.
वैन डीजैक के अनुसार छठा मामला ‘सर्वसम्मति’ का है और इसके तहत अक्सर एकजुटता और समझौता की स्थापना होती है. इस रणनीति के तहत राष्ट्रीय मुद्दे और बाहरी देशों का डर आम जनता को दिखाया जाता है, जिससे एक खास पक्ष में जनता एकजुट हो. सातवां, ‘प्रति तथ्यात्मक’ यानी इसके तहत लोगों की सुहानुभूति जुटाने का कार्य किया जाता है और खुद को ऐसी स्थिति चाहे अल्पसंख्यक धार्मिक या जाति का नाम पर लोगों को अपने पक्ष में किया जाता है. आठवां, खंडन, जो एक वैचारिक रणनीति है और इसके तहत ‘लेकिन’, ‘अभी तक’ या ‘फिर भी’ जैसे शब्दों का प्रयोग कर खुद की स्वच्छ छवि पेश की जाती है. नौवां, व्यंजना, यानी वक्ता सामान्य शब्दों के बदले अपमानजनक या कठोर शब्दों का प्रयोग करता है. दसवां है गोपनीयता, यानी वक्ता अपनी बात को साबित करने के लिए गोपनीय बातों को भी जनता के सामने प्रदर्शित करता है. अपनी बातों को मनवाने के लिए आंकड़े भी लोगों के सामने रखता है.
वैचारिक वर्ग मॉडल के अनुसार चुनावी रणनीति के तहत चित्रण और उदहारण का भी अपना महत्त्व है. इसके तहत वक्ता अपनी बातों को सही ठहराने के लिए हर तरह के यानी सही या झूठे तथ्यों का सहारा लेता है. बारहवें विन्दु में डीजैक ने कहा है कि सामान्यीकरण भी चुनावी रणनीति का अहम् हिस्सा है और इसके तहत किसी खास व्यक्ति के नकारात्मक के साथ-साथ सकारात्मक पहलुओं के बारे में जनता के सामने चित्रण किया जाता है. तेरहवां मामला अतिश्योक्ति का है, जिसके तहत भाषाई रणनीति अपनाई जाती है और किसी भी बात के अर्थ का अनर्थ ढूंढने का काम किया जाता है. चौदहवां मामला ‘निहितार्थ’ का है. इसके तहत वक्ता किसी ख़ास मुद्दे पर संक्षिप और भ्रामक जानकारी देता है और जिस किसी मामले में उसे लगता है कि वह फंस सकता है, उसी बचता है. पंद्रहवां विन्दु है, विडम्बना, यानी वक्ता उस माइलेज की खोज में रहता है कि उसने क्या कहा और लोगों के किस तरह उसे गलत तरीके से लिया और फिर वह आम जनता की सुहानुभूति भाषा या व्यंग्य के जरिये लेता है. 
संचारविद वैन डीजैक के अनुसार, चुनावी रणनीति में शब्दों के चयन का बड़ा ही महत्त्व है और किसी की नकारात्मक और सकारात्मक छवि बनाने में इसकी अहम् भूमिका होती है. वहीं, रूपक के जरिये वैसी दो घटनाओं या वस्तुओं के तुलना की जाती है, जिसके तुलना नहीं हो सकती है और इसके जरिये जनता को दिग्भ्रमित किया जाता है. राष्ट्रीय महिमामंडन भी चुनावी रणनीति का हिस्सा है और इसके तहत इतिहास, सिद्धांत, संस्कृति और परंपरा की आड़ में जनता को अपने पक्ष में किया जाता है. सामान्य अभिव्यक्ति की भी काफी अहमियत है और इसके जरिये जनता को बताया जाता है क्या करना चाहिए और किया नहीं करना चाहिए. चुनावी लड़ाई में ‘नंबर गेम’ के जरिये संख्या और सांख्यिकी के जरिये अपनी बातों को पुख्ता की जाती है. गौरतलब है कि ‘ध्रुवीकरण’ हर चुनाव में किसी खास पार्टी को जिताने और हराने का काम करती है और यह अपने बारे में सकारात्मक और दुसरे के बारे में नकारात्मक बातों को प्रस्तुत करने के कारण ही जनता के बीच पैदा होती है. लोकलुभावनवाद, पूर्वधारणा, संरक्षण, अस्पष्टता और उत्पीडित दिखाना आदि भी चुनावी रणनीति का हिस्सा होता है.

3/18/2019

A Study on the Engagement of Indian Students on Social Media

ABSTRACT 
Social media is an online platform that helps users to connect with people and share thoughts in real-time, globally. Among all the recent social media platforms, Facebook is very popular among young persons and they are known to spend several hours per day using and interacting through Facebook. This study aimed at studying the engagement of Social Work students of an Indian university, Jamia Millia Islamia, New Delhi on Facebook. This research examines their patterns of engagements in terms of time, privacy, advertisements etc. on Facebook. The research also attempts to understand the usage pattern, network patterns and the routine activities of the students.
Keywords: Social Media, Social Networking Sites, Facebook, Social Work, Jamia Millia Islamia.

A Study on the Engagement of Indian Students on Social Media

4/14/2016

सोशल मीडिया क्या है?

एक ओर जहां अभिव्यक्ति के तमाम विकल्प सामने आ रहे हैं, वहीं इस पर अंकुश लगाने की प्रक्रिया भी पूरे विश्व में किसी न किसी रूप में मौजूद है। जहां कहीं भी सरकार को आंदोलन का धुआं उठता दिखाई देता है, तुरंत सरकार की नजर सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफार्म पर जाती है और सीधे तौर पर अंकुश लगाने से नहीं हिचकती। गौरतलब है कि ये सोशल मीडिया के प्लेटफार्म सिर्फ व्यक्तिगत जानकारियों के लिए ही प्रयोग में नहीं लाए जाते बल्कि राजनीतिक और सामाजिक मामलों में में लोगों की रुचि का भी काम करता है
सोशल मीडिया एक तरह से दुनिया के विभिन्न कोनों में बैठे उन लोगों से संवाद है जिनके पास इंटरनेट की सुविधा है। इसके जरिए ऐसा औजार पूरी दुनिया के लोगों के हाथ लगा है, जिसके जरिए वे न सिर्फ अपनी बातों को दुनिया के सामने रखते हैं, बल्कि वे दूसरी की बातों सहित दुनिया की तमाम घटनाओं से अवगत भी होते हैं। यहां तक कि सेल्फी सहित तमाम घटनाओं की तस्वीरें भी लोगों के साथ शेयर करते हैं। इतना ही नहीं, इसके जरिए यूजर हजारों हजार लोगों तक अपनी बात महज एक क्लिक की सहायता से पहुंचा सकता है। अब तो सोशल मीडिया सामान्य संपर्क, संवाद या मनोरंजन से इतर नौकरी आदि ढूंढ़ने, उत्पादों या लेखन के प्रचार-प्रसार में भी सहायता करता है।
कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के प्रोफेसर मैन्युअल कैसट्ल के मुताबिक सोशल मीडिया के विभिन्न माध्यमों फेसबुक, ट्विटर आदि के जरिए जो संवाद करते हैं, वह मास कम्युनिकेशन न होकर मास सेल्फ कम्युनिकेशन है। मतलब हम जनसंचार तो करते हैं लेकिन जन स्व-संचार करते हैं और हमें पता नहीं होता कि हम किससे संचार कर रहे हैं। या फिर हम जो बातें लिख रहे हैं, उसे कोई पढ़ रहा या देख रहा भी होता है।
इंटरनेट ने बदली जीवनशैली
पिछले दो दशकों से इंटरनेट ने हमारी जीवनशैली को बदलकर रख दिया है और हमारी जरूरतें, कार्य प्रणालियां, अभिरुचियां और यहां तक कि हमारे सामाजिक मेल-मिलाप और संबंधों का सूत्रधार भी किसी हद तक कंप्यूटर ही है। सोशल नेटवर्किंग या सामाजिक संबंधों के ताने-बाने को रचने में कंप्यूटर की भूमिका आज भी किस हद तक है, इसे इस बात से जाना जा सकता है कि आप घर बैठे दुनिया भर के अनजान और अपरिचित लोगों से संबंध बना रहे हैं। ऐसे लोगों से आपकी गहरी छन रही है, अंतरंग संवाद हो रहे हैं, जिनसेआपकी वास्तविक जीवन में अभी मुलाकात नहीं हुई है।। इतना ही नहीं, यूजर अपने स्कूल और कॉलेज के उन पुराने दोस्तों को भी अचानक खोज निकाल रहे हैं, जो आपके साथ पढ़े, बड़े हुए और फिर धीरे-धीरे दुनिया की भीड़ में कहीं खो गए।
दरअसल, इंटरनेट पर आधारित संबंध-सूत्रों की यह अवधारणा यानी सोशल मीडिया को संवाद मंचों के तौर पर माना जा सकता है, जहां तमाम ऐसे लोग जिन्होंने वास्तविक रूप से अभी एक-दूसरे को देखा भी नहीं है, एक-दूसरे से बखूबी परिचित हो चले हैं। आपसी सुख-दुख, पढ़ाई-लिखाई, मौज-मस्ती, काम-धंधे की बातें सहित सपनों की भी बातें होती हैं।
अमेरिकी की कठपुतली
दुनिया के दो अहम सोशल नेटवर्किंग साइट्स फेसबुक और ट्विटर जिसका मुख्यालय अमेरिका में है, पूरी दुनिया पर राज कर रहा है। मालूम हो कि फेसबुक की स्थापना 2004 में हार्वर्ड विश्वविद्यालय के छात्रों ने की थी। शुरुआत में इसका नाम फेशमाश था और जुकेरबर्ग ने इसकी स्थापना विश्वविद्यालय के सुरक्षित कंप्यूटर नेटवर्क को हैक करके किया था। हार्वर्ड विवि में उन दिनों छात्रों के बारे में बुनियादी सूचनाएं और फोटो देने वाली अलग से कोई डायरेक्ट्री नहीं थी। कुछ ही घंटों के भीतर जुकेरबर्ग का प्रयोग लोकप्रिय हो गया लेकिन विवि प्रशासन ने इस पर गहरी आपत्ति जताई और जुकेरबर्ग को विवि से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया और उसके बाद फेसबुक ने क्या मुकाम हासिल किया, यह किसी से छुपी हुई नहीं है।
नेटवर्किंग की प्रसिद्ध कंपनी सिस्को ने दुनिया के 18 देशों में कॉलेज जाने वाले युवाओं में इस बात को लेकर कुछ वर्ष पहले एक अध्ययन किया था कि वे अपने संभावित कार्यालय में क्या-क्या चाहते हैं। भारत में 81 प्रतिशत युवाओं ने कहा कि वे लैपटॉप, टैबलेट या स्मार्टफोन के जरिए ही काम करना पसंद करेंगे। 56 प्रतिशत युवाओं ने कहा कि वे ऐसी कंपनी में काम करना पसंद करेंगे, जहां सोशल मीडिया या मोबाइल फोन पर पाबंदी हो।
वहीं, ट्विटर इस दुनिया में 21 मार्च, 2006 को आया और तक से लेकर आज तक यह नित्य नई बुलंदियों को छू रहा है। पहले ट्विटर को केवल कंप्यूटर में प्रयोग किया जा सकता था लेकिन अब यह टैबलेट, स्मार्टफोन आदि में भी डाउनलोड किया जा सकता है। ट्विटर पर अभी तक सिर्फ 140 शब्दों में लिखने की सुविधा थी लेकिन पिछले दिनों इस पर लिखने की शब्दसीमा को बढ़ाया गया है। मालूम हो कि ट्विटर के लिए अभी तक सत्तर हजार से भी अधिक प्लेटफार्म पर अलग-अलग एप्लीकेशनें बन चुकी हैं।
कहां तक है सोशल मीडिया का दायरा
2011 में अरब में हुए आंदोलन में मीडिया खासकर इंटरनेट, मोबाइल तकनीक के अलावा फेसबुक और ट्विटर ने अहम भूमिका निभाई। लीबिया और सीरिया में भी यही हाल रहा। इन आंदोलनों के बाद इंटरनेट सेंसरशिप की प्रवृति जिस कदर बढ़ी है, वह शायद ही कभी देखने को मिली। इसके पक्ष में भले ही बहस की जाती रही लेकिन हकीकत यह है कि अलग-अलग देशों में सेंसरशिप अपने विभिन्न अवतारों में मौजूद है। इंटरनेट पर नियंत्रण करने के लिए कहीं इंटरनेट को ब्लॉक किया गया तो कहीं कॉपीराइट, मानहानि, उत्पीड़न और अवमानना को हथियार बनाया जा रहा है।
भारत के गुजरात में जहां हार्दिक पटेल के आंदोलन को देखते हुए इंटरनेट को बंद कर दिया गया था, वहीं मुंबई में बाला साहेब ठाकरे के निधन पर महाराष्ट्र की एक लड़की के कमेंट और उसकी सहेली के उस कमेंट को लाइक करने का खामियाजा किस तरह भुगतना पड़ा, यह बात किसी से छुपी हुई नहीं है। इतना ही नहीं, पिछले दिनों सरकार ने व्हाट्सएप के संदेशों में लोगों को नब्बे दिनों तक सुरक्षित रखने का आदेश दिया लेकिन मामले के सामने आ जाने और विरोध के कारण केंद्र सरकार को इस प्रस्ताव को तुरंत वापस लेना पड़ा।
हो रही निगरानी
वहीं, अमेरिका में इंटरनेट को सेंसर करने के लिए अमेरिकी कांग्रेस के सामने कुछ वर्ष पहले ‘सोपा’ और ‘पीपा’ नामक विधेयक लाया गया था और इसके विरोध स्वरूप अंग्रेजी विकिपीडिया कुछ वक्त के लिए गुल की गई थी। इंटरनेट पर निगरानी रख रही संस्थानों का दावा है कि सिर्फ अमेरिका में ही नहीं बल्कि पूर्व एशिया, मध्य एशिया और मध्यपूर्व और उत्तरी अफ्रीका ऐसे क्षेत्र हैं, जहां सरकार द्वारा इंटरनेट को सख्त किया जा रहा है। 2010 में ओपन नेट इनिशियेटिव ने विश्व के कुल 40 देशों की लिस्ट जारी की थी, जहां की सरकारें इंटरनेट फिल्टिरिंग कर रही हैं। वहीं, संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद ने इंटरनेट स्वतंत्रता संबंधी प्रस्ताव पांच जुलाई 2012 को पारित कर दिया था और परिषद ने सभी देशों से नागरिकों की इंटरनेट पर अभिव्यक्ति की आजादी को समर्थन देने की अपील की थी।
अंकुश लगाने की प्रक्रिया जारी
एक ओर जहां अभिव्यक्ति के तमाम विकल्प सामने आ रहे हैं, वहीं इस पर अंकुश लगाने की प्रक्रिया भी पूरे विश्व में किसी न किसी रूप में मौजूद है। जहां कहीं भी सरकार को आंदोलन का धुआं उठता दिखाई देता है, तुरंत सरकार की नजर सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफार्म पर जाती है और सीधे तौर पर अंकुश लगाने से नहीं हिचकती। गौरतलब है कि ये सोशल मीडिया के प्लेटफार्म सिर्फ व्यक्तिगत जानकारियों के लिए ही प्रयोग में नहीं लाए जाते बल्कि राजनीतिक और सामाजिक मामलों में में लोगों की रुचि का भी काम करता है। याद करें देश की राजधानी दिल्ली में 2012 में हुए गैंग रेप को कि कैसे लोग दोषियों को सजा दिलाने के लिए एकजुट होकर उठ खड़े हुए थे। इन साइटों पर रेप, मर्डर, गर्ल एजुकेशन जैसे पेज प्रमुख थे। हालांकि पूर्वोत्तर राज्यों को लेकर उठी नफरत की आंधी बेलगाम सोशल मीडिया का नतीजा था और इसका पूरा प्रभाव पूरे देश में देखने को मिला था।
सभी ने मन लोहा
इतना ही नहीं, लोकसभा चुनाव में इसकी पूरी ताकत देखने को मिली। हालांकि अमेरिका में बराक ओबामा ने सोशल नेटवर्किंग साइट्स की ताकत का लोहा पहले ही दिखा चुके थे। भारत में नरेंद्र मोदी ने इसका भरपूर उपयोग किया और इसका फायदा भाजपा को भी मिला। नरेंद्र मोदी भले ही पूरे चार सौ से अधिक संसदीय क्षेत्र का दौरा किया लेकिन उन्होंने फेसबुक, ट्विटर और यू-ट्यूब के जरिए जिस तरह लोकप्रियता हासिल की, वह एक नया इतिहास है। लोग उनके फेसबुक पर पोस्ट की गई बातों और तस्वीरों को पोस्ट करते, प्रतिक्रिया देता और उनकी लोकप्रियता में चार चांद लगाते। वहीं, दूसरी ओर, उनके तमाम प्रतिद्वंद्वी उनकी रणनीति की कोट पूरे चुनावी समर में सामने नहीं ला पाए और जाहिर सी बात है कि वे चारों खाने चित्त गिरे।
(लेखक एक दशक तक दैनिक भास्कर,देशबन्धुराष्ट्रीय सहारा और हिंदुस्तान जैसे अखबारों में सक्रिय पत्रकारिता करने के बाद इन दिनों जामिया मिल्लिया इस्लामिया से मीडिया पर शोध कर रहे हैं. उन्होंने माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय नोएडा कैंपसजामिया मिल्लिया इस्लामिया के अलावा दिल्ली विश्वविद्यालय के रामलाल आनंद कॉलेज में बतौर गेस्ट लेक्चरर अध्यापन भी किया है. )