6/18/2020

मुंबई में एक मौत, स्टारडम की ब्रांडिंग और ट्रोल आर्मी


विनीत उत्पल
प्रसिद्ध कमलेश्वर की एक कहानी है ‘दिल्ली में एक मौत’. इसमें एक व्यक्ति की मौत पर उसके अंतिम संस्कार में जो लोग आते हैं, उन्हें मरने वाले से मतलब नहीं था बल्कि वे मौके पर पहुंचकर अपना पीआर बढाने में जुटे होते हैं. वैसे ही सुशांत सिंह राजपूत की मौत पर बॉलीवुड सितारों का रवैया दिखा. उनके जो निकट मित्र रहे, वे सदमें में हैं और गम में डूबे हुए हैं. अंतिम संस्कार में उनके पारिवारिक सदस्यों के अलावा, अभिनेत्री कृति सेनन, श्रद्धाकपूररिया चक्रवर्ती, अभिनेता विवेक ओबेरॉय, रणदीप हुड्डा, कांग्रेस नेता संजय निरुपम, निर्देशक अभिषेक कपूर, सुनील शेट्टी, राजकुमार राव, वरुण शर्मा आदि मौजूद रहे। 

वहीं, सुशांत सिंह राजपूत के नाम को भुनाने वाले या तो उससे अपनी नजदीकी या फिर अपनी समस्या को उसके सर मढ़कर भरपूर तौर पर भुनाने की कोशिश की. जिस तरह मीडिया में छाने के लिए बॉलीवुड स्टार पक्ष में या विपक्ष में अनाप-शनाप बयान देकर मीडिया में सुर्खियां पाई, राष्ट्रीय न्यूज मीडिया ने भी दी दिन तक इस मामले को भरपूर तूल दी. यह मुंबई में हुई एक मौत पर स्टारडम की ब्रांडिंग का एक नमूना है. दिलचस्प है कि जब बॉलीवुड की तथाकथित नामचीन हस्तियों के नाम सामने आने लगे तो तमाम न्यूज चैनल ने सुशांत सिंह राजपूत की खबर को गायब ही कर दिया. 
सुशांत सिंह राजपूत की मौत के बाद जिस तरह से बॉलीवुड और मीडिया में कोहराम मचा, वह फ़िल्मी दुनिया की कार्यप्रणाली पर अलग तरह से सोचने को विवश करता है. कंगना रनौत ने भाई-भतीजे का आरोप लगाया. शेखर कपूर ने कहा कि मैं उसके दर्द को समझ सकता हूं. निखिल द्विवेदी ने भी निशाना साधते हुए कहा फिल्म इंडस्ट्री का दिखावा मुझे शर्मिंदा करता है. जाहिर-सी बात है कि बॉलीवुड इस मौत के मामले में दो भागों में बंटा और हर कोई अपने-अपने नजर से सुशांत की मौत को आंकलन किया. सुशांत की मानसिक परेशानी यानी डिप्रेशन, फिल्मों का न मिलना, गिरते करियर ग्राफ आदि को लेकर तमाम बातें बॉलीवुड हलके में कही गई. यहां तक कि कुछ लोग कमाल खान की बातों को आधार बनाकर ऑनलाइन हस्ताक्षर अभियान भी चलाया और भारतीय सिनेमा में नेपोटिज्म (भाई-भतीजावाद) के विरोध में खड़े हुए. इसके तहत नेटफ्लिक्स, अमेज़न प्राइम और हॉट स्टार जैसे लोकप्रिय स्ट्रीमिंग कंपनियों से पूछा गया कि कुछ ख़ास मीडिया घरानों की फिल्मों को अपने यहां प्रोमोट की प्रक्रिया को तुरंत प्रभाव से रोकें. उनका मानना रहा कि ये मीडिया घराने फिल्म नहीं बनाते वरन प्रख्यात फ़िल्मी कलाकार के बच्चों को लांच करते हैं और इस तरह फ़िल्मी दुनिया में भाई-भतीजावाद फैलाते हैं.
राष्ट्रीय मीडिया सहित फ़िल्मी हलकों में यह बात साफ़ तौर पर कही जा रही है कि करण जौहर, सलमान खान, भट्ट परिवार, कपूर फैमिली, यशराज फिल्म्स, भंसाली, सहित तमाम लोग उस एलीट गैंग के सदस्य हैं और इनकी छत्रछाया के बिना किसी बाहरी लोगों को काम नहीं मिल सकता है. दिलचस्प है कि फिल्म बनाने के मामले में भारत दुनिया के दूसरे नंबर पर है लेकिन इसका नियंत्रण सिर्फ और सिर्फ आधे दर्जन लोगों के पास है. इस मामले में सत्यता इसलिए भी दिखती है क्योंकि सुशांत सिंह राजपूत की फिल्म ‘सोनचरैया’ जब रिलीज हुई तब उसने अपने इंस्टाग्राम पर लिखा था, ‘बॉलीवुड में मेरा कोई गॉडफादर नहीं है और यदि आप मेरी फ़िल्में नहीं देखेंगे तो मैं यहां से बाहर हो जाऊंगा.’ हालांकि कांग्रेस नेता संजय सिंह निरुपम ने आरोप लगाया था कि मुंबई ने दबंग मीडिया घरानों के दबाव में उनसे सात फ़िल्में वापस ले ली गईं.
मुंबई की मीडिया के कारस्तानी दिलचस्प है जिसके तहत सुशांत सिंह राजपूत के खास मित्रों को टारगेट किया गया और उन्हें सोशल मीडया के तमाम प्लेटफोर्म पर ट्रोल भी किया गया और कहा गया कि उनके खास लोगों ने उनकी मृत्यु पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी. यही कारण है कि सुशांत के मित्र और अभिनेत्री कृति सेनन को अपने इनस्टाग्राम पर लिखना पड़ा, "कुछ मीडियाकर्मी अपनी संवेदनशीलता पूरी तरह से खो चुके हैं. ऐसे समय में वह आपसे लाइव आकर कमेंट करने की गुजारिश करते हैं. अंतिम संस्कार में जाते वक्त साफ तस्वीर क्लिक करने के लिए कार का दरवाजा ठोकना और बोलना कि मैडम शीशा नीचे करो न. अंतिम संस्कार पर्सनल होते हैं. इंसानियत को काम से ऊपर रखें. हम भी साधारण इंसान हैं और हमारी भी कुछ भावनाएं हैं. यह मत भूलो." वहीं ट्रोल करने वालों को लेकर भी कृति सेनन ने कहा, यह बहुत ही विचित्र है कि ट्रोल और गॉसिप करने वाले लोग अचानक जागे और आपकी अच्छाईयों के बारे में बात करने लग जाए जब आप इस दुनिया में नहीं है. सोशल मीडिया सबसे फेक और जहरीली जगह है. यदि आपने पब्लिकली कुछ नहीं लिखा और आरआईपी पोस्ट नहीं किया तो समझ लिया जाता है कि आपको दुख नहीं है, जबकि रियलिटी में यही लोग सबसे ज्यादा दुखी होते हैं. ऐसा लगता है कि सोशल मीडिया रियल दुनिया है और रियल दुनिया फेक समझी जाने लगी है."
कृति सेनन की छोटी बहन नुपुर सेनन ने लिखा कि हर कोई सुशांत की मानसिक स्वास्थ्य को लेकर लिखने लगा और हम जैसे लोगों को लेकर ट्विटर पर लिखने लगा, सन्देश भेजने लगा कि आप लोगों ने इंस्टाग्राम पर उसकी मृत्यु पर कुछ नहीं लिखा. “एक पोस्ट तक नहीं डाला”. “तुम लोगों ने एक रिएक्शन नहीं दिया, कितने पत्थर दिल हो तुम.” नुपुर आगे सवाल करती हैं कि आप की परमिशन हो तो सुकून से रो सकते हैं? प्लीज. क्या स्वस्फूर्त या किसी के मातहत कार्य कर रहे ट्रोलआर्मी का यही काम है कि वह किसी की मौत में एक मौका तलाशे और ट्रोल करे? हालांकि अभिनेत्री श्रद्धा कपूर, अंकिता लोखंडे और रिया चक्रवर्ती ने लोगों के ट्रोल करने के बाद भी खामोशी बरती और अपने गम को छुपाती रही हैं.  
बहरहाल, सवाल यह है कि किसी के मरने पर मीडिया सिद्धांत या फिर मीडिया नैतिकता क्या कहता है? क्या किसी के मरने को एक तमाशा बना दिया जाय और उससे जुड़े उन लोगों की प्रतिक्रिया मांगी जाय जो उससे सीधे जुड़े हैं और गम में हैं? सवाल मनुष्य की नैतिकता की भी है कि मरने पर अपनी पब्लिशिटी के लिए मृतक बड़े-बड़े लेख लिखें, टीवी पर आयें और किसी के स्टारडम को भुना लें, जब तक कि कोई दूसरे मामले सुर्खियां न बन जाय.   

6/14/2020

भारतीय मीडिया, भारतीय सीमा और रिपोर्टिंग

विनीत उत्पल
टेलीविजन मीडिया जिस तरह से देश की सीमाओं को लेकर ख़बरें दिखा रहा है, इस पर विचार करना आवश्यक है कि किस राह पर भारत की मीडिया इंडस्ट्री जा रही है. प्राइम टाइम की ख़बरों पर नजर डालें तो ऐसा लगता है कि भारत एक ऐसा देश है जो पाकिस्तान, चीन और नेपाल के साथ लगातार सीमा विवादों और सैन्य मुकाबलों की ओर बढ़ रहा है. मीडिया की ख़बरों में दिखता है कि भारतीय सेना ने पाकिस्तान के बंकरों को तबाह कर दिया तो चीन की सेना को घुटने टेकने के लिए मजबूर कर दिया. दिलचस्प है कि पिछले कुछ दशकों में अमेरिकी-चीन के शीत युद्ध में हर बार चीन भारी पड़ा है, ऐसे में भारतीय मीडिया की हेडलाइन भारतीय सेना के कारनामे को भी कठघरे में भी खड़े करती है.

मीडिया पैनल में देश के तमाम रक्षा विशेषज्ञ भारत-चीन, भारत-पाकिस्तान और भारत-नेपाल को लेकर अपने विचार प्रकट कर रहे हैं, जैसे लगता है वे ही सीमा क्षेत्र की वास्तविकता से अवगत हैं और कोई नहीं. उनका गुस्सा करने के नाटक देखने लायक होता है और तमाम नौटंकी उस खबर के आधार पर होती है जिसे न तो कोई पुख्ता किया होता है और न ही उसका वास्तविक आधार होता है. इस विषय में किसी भी किसी देश का अधिकारिक बयान नहीं होता, बल्कि भारत हो या चीन या पाकिस्तान की मीडिया की ख़बरें होती हैं. सेना के तमाम पूर्व अधिकारी वर्तमान हालातों को छोड़कर अतीत की बातों को ज्यादा तवज्जो दे रहे हैं. भारत के कब-कब और किस-किस इलाके में पाकिस्तान और चीन को हराया जैसे मामले को रेख्नाकित कर रहे हैं और वर्तमान स्थिति को लेकर उनका ज्ञान न्यूनतम होता है.
कभी कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने मजाक में ही कहा था कि चाय बेचने वाला चाय ही बेच सकता है, सरकार नहीं. परिस्थितियां बदली और चाय वाला पिछले छह वर्षों से देश चला रहा है, चाय नहीं बेच रहा. जाहिर है, तमाम लोगों और देशों की स्थितियां बदलती है और समाज आगे बढ़ता है. ऐसे में क्या इस बात के इनकार किया जा सकता है कि किसी देश के साथ भारत की लड़ाई के इतने वर्षों बाद क्या भारत सहित उसके पड़ोसी देशों ने अपनी सेना को सशक्त बनाने के लिए कुछ नहीं किया होगा. कहा जाता है कि कभी भी किसी दुश्मन को कम नहीं आंकना चाहिए. मगर, भारतीय मीडिया जिस तरह के भारत की तस्वीर दर्शकों के सामने रख रख रही है, ऐसा लगता है कि दुनिया के सबसे वीर और क्रूर सेना में भारतीय सेना शामिल है. जबकि वस्तविकता यह है कि भारत की कूटनीतिक रणनीति रही है कि वह कभी भी किसी देश पर आगे बढ़कर हमला नहीं किया है.  

आज की भारतीय टीवी मीडिया पाकिस्तान, चीन और नेपाल को भारत के सबसे बड़े दुश्मन के तौर पर पेश कर रही है, जबकि स्थिति यह है कि पड़ोसी देशों के साथ भारत के व्यापारिक और सांस्कृतिक संबंध काफी तगड़े रहे हैं. आज भी भारत की काफी संख्या में भारत और पाकिस्तान के लोगों की शादियां एक-दूसरे के यहां होती हैं और उर्स के मौके पर एक-दूसरे के यहां आते हैं. भारत और नेपाल के बीच ‘रोटी-बेटी’ का रिश्ता माना जाता है और उस मर्यादापुरुषोत्तम राम का ससुराल नेपाल के जनकपुर में है, जिनका कद आस्था के मामले में सबसे बड़ा है. भारत में पैदा हुआ बौद्ध धर्म मानने वालों की संख्या चीन में अधिक है और चीन के लोग गौतम बुद्ध से जुड़े स्थानों पर भ्रमण करने हर वर्ष काफी संख्या में आते हैं.
भारतीय टेलीविजन मीडिया की हालत ऐसी है कि सिर्फ और सिर्फ उसके पोस्टर बॉय यानी एंकर की सर्वज्ञाता है. वह स्टूडियो में बैठकर ख़बरों का विश्लेषण करेगा और फिर फील्ड में जाकर रिपोर्टिंग भी. आज के टीवी एंकर जिस तरह के अपने पैनल पर आने वाले गेस्ट पर या किसी विषय पर चिल्लाते हैं, क्या यही एंकर या पत्रकार का गुण है? यदि सरकार के सकारात्मक कार्यों को सामने रखने का कार्य का है तो नकारात्मक कार्यों को लेकर सरकार से पूछने की जिम्मेदारी भी पत्रकार की ही है. परदे के पीछे के संवाददाता क्या करते हैं, कोई नहीं जानता. एक विश्लेषण करें तो पाएंगे कि किसी भी टीवी चैनल के कितने रिपोर्टर सीमा के इलाके में लगातार रहकर रिपोर्टिंग कर रहे हैं, तो प्रिंट मीडिया को छोड़ दें तो संख्या सिफर मिलेगी. टीवी रिपोर्टर कश्मीर, जम्मू, अहमदाबाद, चंडीगढ़ या दिल्ली जैसी जगहों में रहकर सीमा पर हो रही हलचलों की जानकारी देता है. ज्यादा हुआ तो किसी व्यक्ति के ट्विटर, फेसबुक जैसे सोशल मीडिया पर पोस्ट किये गए विडियो को अपनी खबरों से जोड़कर न्यूज पैकज में तमाम चैनल पेश करते हैं.
सीमा रेखा और वहां पर हो रहे विवाद को लेकर मीडिया संस्थानों और सरकार को गंभीरता बरतने की आवश्यकता है. देश में तमाम पत्रकारिता प्रशिक्षण संस्थान संचालित हो रहे हैं लेकिन आज तक कहीं भी ‘पीस जर्नलिज्म’, ‘वॉर जर्नलिज्म’, ‘कनफ्लिक्ट जर्नलिज्म’ आदि से जुड़े न तो कोई कोर्स ही सामने आये और न ही किसी मीडिया संस्थानों का ध्यान ही गया कि अपने पत्रकारों को वे प्रशिक्षित करें. क्राइम बीट देखने वाला पत्रकार ही लोकल क्राइम की ख़बरों को कवर करेगा, वही, दंगा-फसाद को लोकर, वही नेशनल क्राइम को भी, वही दाउद इब्राहीम को भी, वही कश्मीर और पंजाब में पकड़े गए आतंकवादियों को लेकर तो वही इंटरनेशनल क्राइम की भी रिपोर्ट करेगा. हालात यह कि देश में कायदे से अपराध पत्रकारिता का भी प्रशिक्षण भी किसी को नहीं दिया जाता है. यदि अमेरिकी सरकार को रक्षा तंत्र पेंटागन सहित तमाम संस्थानों को देखें तो पाएंगे कि वहां किस-किस तरह के पत्रकारों को रिपोर्टिंग के लिए प्रशिक्षित किया जाता है. भारत में स्थिति इसके उलट है, यहां के पत्रकार जब नौकरी में आते हैं, तो उनके समुचित और निरंतर प्रशिक्षण की कोई सटीक योजना किसी भी संस्थान के पास नहीं होती. अंतरराष्ट्रीय मामलों में किसी अन्य संस्थानों से कोई समझौता नहीं होता, जिसे एक-दूसरे के यहाँ के पत्रकारों को प्रशिक्षण मिल सके. कोई विदेशी भाषा सीखने के लिए मीडिया संस्थान अपने पत्रकारों को प्रोत्साहित नहीं करते, जिससे विपरीत परिस्थिति आने पर विदेशी की खबरों को प्रसारित या प्रकाशित करने में आसानी हो. भारतीय पत्रकार तमाम समय में अपनी नौकरी बचाने की जुगाड़ में लगे रहते हैं क्योंकि प्रबंधन इतना प्रभावी हो चुका है, कि कौन पत्रकार, कौन संपादक की नौकरी कब चली जाय, कोई नहीं जानता, तो ऐसे में वह अपनी काबिलियत किस तरह बढ़ाएगा, यह अहम सवाल है.       

3/18/2019

A Study on the Engagement of Indian Students on Social Media

ABSTRACT 
Social media is an online platform that helps users to connect with people and share thoughts in real-time, globally. Among all the recent social media platforms, Facebook is very popular among young persons and they are known to spend several hours per day using and interacting through Facebook. This study aimed at studying the engagement of Social Work students of an Indian university, Jamia Millia Islamia, New Delhi on Facebook. This research examines their patterns of engagements in terms of time, privacy, advertisements etc. on Facebook. The research also attempts to understand the usage pattern, network patterns and the routine activities of the students.
Keywords: Social Media, Social Networking Sites, Facebook, Social Work, Jamia Millia Islamia.

A Study on the Engagement of Indian Students on Social Media

4/14/2016

सोशल मीडिया क्या है?

एक ओर जहां अभिव्यक्ति के तमाम विकल्प सामने आ रहे हैं, वहीं इस पर अंकुश लगाने की प्रक्रिया भी पूरे विश्व में किसी न किसी रूप में मौजूद है। जहां कहीं भी सरकार को आंदोलन का धुआं उठता दिखाई देता है, तुरंत सरकार की नजर सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफार्म पर जाती है और सीधे तौर पर अंकुश लगाने से नहीं हिचकती। गौरतलब है कि ये सोशल मीडिया के प्लेटफार्म सिर्फ व्यक्तिगत जानकारियों के लिए ही प्रयोग में नहीं लाए जाते बल्कि राजनीतिक और सामाजिक मामलों में में लोगों की रुचि का भी काम करता है
सोशल मीडिया एक तरह से दुनिया के विभिन्न कोनों में बैठे उन लोगों से संवाद है जिनके पास इंटरनेट की सुविधा है। इसके जरिए ऐसा औजार पूरी दुनिया के लोगों के हाथ लगा है, जिसके जरिए वे न सिर्फ अपनी बातों को दुनिया के सामने रखते हैं, बल्कि वे दूसरी की बातों सहित दुनिया की तमाम घटनाओं से अवगत भी होते हैं। यहां तक कि सेल्फी सहित तमाम घटनाओं की तस्वीरें भी लोगों के साथ शेयर करते हैं। इतना ही नहीं, इसके जरिए यूजर हजारों हजार लोगों तक अपनी बात महज एक क्लिक की सहायता से पहुंचा सकता है। अब तो सोशल मीडिया सामान्य संपर्क, संवाद या मनोरंजन से इतर नौकरी आदि ढूंढ़ने, उत्पादों या लेखन के प्रचार-प्रसार में भी सहायता करता है।
कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के प्रोफेसर मैन्युअल कैसट्ल के मुताबिक सोशल मीडिया के विभिन्न माध्यमों फेसबुक, ट्विटर आदि के जरिए जो संवाद करते हैं, वह मास कम्युनिकेशन न होकर मास सेल्फ कम्युनिकेशन है। मतलब हम जनसंचार तो करते हैं लेकिन जन स्व-संचार करते हैं और हमें पता नहीं होता कि हम किससे संचार कर रहे हैं। या फिर हम जो बातें लिख रहे हैं, उसे कोई पढ़ रहा या देख रहा भी होता है।
इंटरनेट ने बदली जीवनशैली
पिछले दो दशकों से इंटरनेट ने हमारी जीवनशैली को बदलकर रख दिया है और हमारी जरूरतें, कार्य प्रणालियां, अभिरुचियां और यहां तक कि हमारे सामाजिक मेल-मिलाप और संबंधों का सूत्रधार भी किसी हद तक कंप्यूटर ही है। सोशल नेटवर्किंग या सामाजिक संबंधों के ताने-बाने को रचने में कंप्यूटर की भूमिका आज भी किस हद तक है, इसे इस बात से जाना जा सकता है कि आप घर बैठे दुनिया भर के अनजान और अपरिचित लोगों से संबंध बना रहे हैं। ऐसे लोगों से आपकी गहरी छन रही है, अंतरंग संवाद हो रहे हैं, जिनसेआपकी वास्तविक जीवन में अभी मुलाकात नहीं हुई है।। इतना ही नहीं, यूजर अपने स्कूल और कॉलेज के उन पुराने दोस्तों को भी अचानक खोज निकाल रहे हैं, जो आपके साथ पढ़े, बड़े हुए और फिर धीरे-धीरे दुनिया की भीड़ में कहीं खो गए।
दरअसल, इंटरनेट पर आधारित संबंध-सूत्रों की यह अवधारणा यानी सोशल मीडिया को संवाद मंचों के तौर पर माना जा सकता है, जहां तमाम ऐसे लोग जिन्होंने वास्तविक रूप से अभी एक-दूसरे को देखा भी नहीं है, एक-दूसरे से बखूबी परिचित हो चले हैं। आपसी सुख-दुख, पढ़ाई-लिखाई, मौज-मस्ती, काम-धंधे की बातें सहित सपनों की भी बातें होती हैं।
अमेरिकी की कठपुतली
दुनिया के दो अहम सोशल नेटवर्किंग साइट्स फेसबुक और ट्विटर जिसका मुख्यालय अमेरिका में है, पूरी दुनिया पर राज कर रहा है। मालूम हो कि फेसबुक की स्थापना 2004 में हार्वर्ड विश्वविद्यालय के छात्रों ने की थी। शुरुआत में इसका नाम फेशमाश था और जुकेरबर्ग ने इसकी स्थापना विश्वविद्यालय के सुरक्षित कंप्यूटर नेटवर्क को हैक करके किया था। हार्वर्ड विवि में उन दिनों छात्रों के बारे में बुनियादी सूचनाएं और फोटो देने वाली अलग से कोई डायरेक्ट्री नहीं थी। कुछ ही घंटों के भीतर जुकेरबर्ग का प्रयोग लोकप्रिय हो गया लेकिन विवि प्रशासन ने इस पर गहरी आपत्ति जताई और जुकेरबर्ग को विवि से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया और उसके बाद फेसबुक ने क्या मुकाम हासिल किया, यह किसी से छुपी हुई नहीं है।
नेटवर्किंग की प्रसिद्ध कंपनी सिस्को ने दुनिया के 18 देशों में कॉलेज जाने वाले युवाओं में इस बात को लेकर कुछ वर्ष पहले एक अध्ययन किया था कि वे अपने संभावित कार्यालय में क्या-क्या चाहते हैं। भारत में 81 प्रतिशत युवाओं ने कहा कि वे लैपटॉप, टैबलेट या स्मार्टफोन के जरिए ही काम करना पसंद करेंगे। 56 प्रतिशत युवाओं ने कहा कि वे ऐसी कंपनी में काम करना पसंद करेंगे, जहां सोशल मीडिया या मोबाइल फोन पर पाबंदी हो।
वहीं, ट्विटर इस दुनिया में 21 मार्च, 2006 को आया और तक से लेकर आज तक यह नित्य नई बुलंदियों को छू रहा है। पहले ट्विटर को केवल कंप्यूटर में प्रयोग किया जा सकता था लेकिन अब यह टैबलेट, स्मार्टफोन आदि में भी डाउनलोड किया जा सकता है। ट्विटर पर अभी तक सिर्फ 140 शब्दों में लिखने की सुविधा थी लेकिन पिछले दिनों इस पर लिखने की शब्दसीमा को बढ़ाया गया है। मालूम हो कि ट्विटर के लिए अभी तक सत्तर हजार से भी अधिक प्लेटफार्म पर अलग-अलग एप्लीकेशनें बन चुकी हैं।
कहां तक है सोशल मीडिया का दायरा
2011 में अरब में हुए आंदोलन में मीडिया खासकर इंटरनेट, मोबाइल तकनीक के अलावा फेसबुक और ट्विटर ने अहम भूमिका निभाई। लीबिया और सीरिया में भी यही हाल रहा। इन आंदोलनों के बाद इंटरनेट सेंसरशिप की प्रवृति जिस कदर बढ़ी है, वह शायद ही कभी देखने को मिली। इसके पक्ष में भले ही बहस की जाती रही लेकिन हकीकत यह है कि अलग-अलग देशों में सेंसरशिप अपने विभिन्न अवतारों में मौजूद है। इंटरनेट पर नियंत्रण करने के लिए कहीं इंटरनेट को ब्लॉक किया गया तो कहीं कॉपीराइट, मानहानि, उत्पीड़न और अवमानना को हथियार बनाया जा रहा है।
भारत के गुजरात में जहां हार्दिक पटेल के आंदोलन को देखते हुए इंटरनेट को बंद कर दिया गया था, वहीं मुंबई में बाला साहेब ठाकरे के निधन पर महाराष्ट्र की एक लड़की के कमेंट और उसकी सहेली के उस कमेंट को लाइक करने का खामियाजा किस तरह भुगतना पड़ा, यह बात किसी से छुपी हुई नहीं है। इतना ही नहीं, पिछले दिनों सरकार ने व्हाट्सएप के संदेशों में लोगों को नब्बे दिनों तक सुरक्षित रखने का आदेश दिया लेकिन मामले के सामने आ जाने और विरोध के कारण केंद्र सरकार को इस प्रस्ताव को तुरंत वापस लेना पड़ा।
हो रही निगरानी
वहीं, अमेरिका में इंटरनेट को सेंसर करने के लिए अमेरिकी कांग्रेस के सामने कुछ वर्ष पहले ‘सोपा’ और ‘पीपा’ नामक विधेयक लाया गया था और इसके विरोध स्वरूप अंग्रेजी विकिपीडिया कुछ वक्त के लिए गुल की गई थी। इंटरनेट पर निगरानी रख रही संस्थानों का दावा है कि सिर्फ अमेरिका में ही नहीं बल्कि पूर्व एशिया, मध्य एशिया और मध्यपूर्व और उत्तरी अफ्रीका ऐसे क्षेत्र हैं, जहां सरकार द्वारा इंटरनेट को सख्त किया जा रहा है। 2010 में ओपन नेट इनिशियेटिव ने विश्व के कुल 40 देशों की लिस्ट जारी की थी, जहां की सरकारें इंटरनेट फिल्टिरिंग कर रही हैं। वहीं, संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद ने इंटरनेट स्वतंत्रता संबंधी प्रस्ताव पांच जुलाई 2012 को पारित कर दिया था और परिषद ने सभी देशों से नागरिकों की इंटरनेट पर अभिव्यक्ति की आजादी को समर्थन देने की अपील की थी।
अंकुश लगाने की प्रक्रिया जारी
एक ओर जहां अभिव्यक्ति के तमाम विकल्प सामने आ रहे हैं, वहीं इस पर अंकुश लगाने की प्रक्रिया भी पूरे विश्व में किसी न किसी रूप में मौजूद है। जहां कहीं भी सरकार को आंदोलन का धुआं उठता दिखाई देता है, तुरंत सरकार की नजर सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफार्म पर जाती है और सीधे तौर पर अंकुश लगाने से नहीं हिचकती। गौरतलब है कि ये सोशल मीडिया के प्लेटफार्म सिर्फ व्यक्तिगत जानकारियों के लिए ही प्रयोग में नहीं लाए जाते बल्कि राजनीतिक और सामाजिक मामलों में में लोगों की रुचि का भी काम करता है। याद करें देश की राजधानी दिल्ली में 2012 में हुए गैंग रेप को कि कैसे लोग दोषियों को सजा दिलाने के लिए एकजुट होकर उठ खड़े हुए थे। इन साइटों पर रेप, मर्डर, गर्ल एजुकेशन जैसे पेज प्रमुख थे। हालांकि पूर्वोत्तर राज्यों को लेकर उठी नफरत की आंधी बेलगाम सोशल मीडिया का नतीजा था और इसका पूरा प्रभाव पूरे देश में देखने को मिला था।
सभी ने मन लोहा
इतना ही नहीं, लोकसभा चुनाव में इसकी पूरी ताकत देखने को मिली। हालांकि अमेरिका में बराक ओबामा ने सोशल नेटवर्किंग साइट्स की ताकत का लोहा पहले ही दिखा चुके थे। भारत में नरेंद्र मोदी ने इसका भरपूर उपयोग किया और इसका फायदा भाजपा को भी मिला। नरेंद्र मोदी भले ही पूरे चार सौ से अधिक संसदीय क्षेत्र का दौरा किया लेकिन उन्होंने फेसबुक, ट्विटर और यू-ट्यूब के जरिए जिस तरह लोकप्रियता हासिल की, वह एक नया इतिहास है। लोग उनके फेसबुक पर पोस्ट की गई बातों और तस्वीरों को पोस्ट करते, प्रतिक्रिया देता और उनकी लोकप्रियता में चार चांद लगाते। वहीं, दूसरी ओर, उनके तमाम प्रतिद्वंद्वी उनकी रणनीति की कोट पूरे चुनावी समर में सामने नहीं ला पाए और जाहिर सी बात है कि वे चारों खाने चित्त गिरे।
(लेखक एक दशक तक दैनिक भास्कर,देशबन्धुराष्ट्रीय सहारा और हिंदुस्तान जैसे अखबारों में सक्रिय पत्रकारिता करने के बाद इन दिनों जामिया मिल्लिया इस्लामिया से मीडिया पर शोध कर रहे हैं. उन्होंने माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय नोएडा कैंपसजामिया मिल्लिया इस्लामिया के अलावा दिल्ली विश्वविद्यालय के रामलाल आनंद कॉलेज में बतौर गेस्ट लेक्चरर अध्यापन भी किया है. )

खबरों का खेल बनाम एजेंडा सेटिंग

मालूम हो कि एजेंडा सेटिंग तीन तरीके से होता हैमीडिया एजेंडाजो मीडिया बहस करता है। दूसरा पब्लिक एजेंडा जिसे व्यक्तिगत तौर पर लोग बातचीत करते हैं और तीसरा पॉलिसी एजेंडा जिसे लेकर पॉलिसी बनाने वाले विचार करते हैं। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि राजनीति काफी हद तक मीडिया को प्रभावित करती है। ऐसे में मीडिया कौन-सी खबरों को तवज्जो देता हैकिस खबर का न्यूज वेल्यू किस तरह आंकता है और ऑडियंस की रुचि कैसी खबरों में हैआदि बातें मायने रखती हैं और फिर खबरों के प्रसारण के बाद उन्हीं बातों पर आम लोग अपनी राय कायम करते हैं।(मैक्सवेल)
खबरों के शतरंजी खेल में कौन ‘राजा” है और कौन ‘प्यादा”, दर्शकों और पाठकों के लिए इसे समझना काफी मुश्किल है। हालांकि वे अपनी राय खबरिया चैनलों पर दिखाई जा रही खबरों और अखबारों में छपे मोटे-मोटे अक्षरों के हेडलाइंस को पढ़कर ही बनाती है और लगातार उन मुद्दों पर विचार-विमर्श भी करती है। यही वह विंदु होता है जहां से मीडिया की एजेंडा सेटिंग का प्रभाव पड़ना शुरू होता है। मीडिया की एजेंडा सेटिंग थ्योरी कहती है कि मीडिया कुछ घटनाओं या मुद्दों को कमोबेश कवरेज देकर राजनीतिक, आर्थिक व सामाजिक बहसों या चर्चाओं का एजेंडा तय करता है। आज खबरिया चैनलों पर प्राइम टाइम की खबरें देंखें तो यह एजेंडा सेटिंग पूरी तरह साफ-साफ समझ में आती है। इस प्राइम टाइम पर सिर्फ खबरें ही नहीं दिखाई जाती बल्कि जोरदार चर्चा के साथ बहस भी की जाती है। चाहे ईपीएफ पर कर लगाने की बात हो या फिर जेएनयू के छात्रों पर मुकदमा दर्ज करने का मामला।
अन्ना आंदोलन के दौरान लोकपाल मामले में संसद में बहस के दौरान शरद यादव ने युवा सांसदों से सवाल किया था कि आप लोग बुद्धू बक्से में बहस के लिए क्यों जाते हैं। वह पिछले दस सालों से वहां बहस करने के लिए नहीं जाते हैं। तो उन्होंने जाने-अनजाने जिस मुद्दे की ओर पूरा देश का ध्यान आकर्षित किया था, उसे पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया। उन्होंने इसी मीडिया एजेंडा थ्योरी की ओर ही ध्यान आकर्षित कराया था। इस थ्योरी को सरकार के साथ-साथ राजनीतिक दल और कॉरपोरेट समूह बखूबी समझते हैं क्योंकि इसका आकलन इस बात से किया जा सकता है कि जब भर किसी गंभीर मसला सामने आता है तो विभिन्न राजनीतिक पार्टियां, सरकार और कॉरपोरेट समूह के तेजतर्रार प्रवक्ता इस पर चर्चा कर रहे होते हैं और अपने हिसाब से एजेंडे का मुंह मोड़ते रहते हैं।
आज पाठक या दर्शक ही मीडिया का प्रोडक्ट हो चुका है। जाहिर-सी बात है कि हर प्रोडक्ट को एक बाजार की जरूरत होती है और मीडिया का बाजार और खरीदार का रास्ता विज्ञापन से होकर विज्ञापन तक जाता है। यानी मीडिया का बाजार उसका विज्ञापनदाता है। इस मसले को अमेरिका के संदर्भ में नोम चोमस्की अच्छी तरह समझाते हैं। वे लिखते हैं कि वास्तविक मास मीडिया लोगों को डायवर्ट कर रही है। वे प्रोफेशनल स्पोट्र्स, सेक्स स्कैंडल या फिर बड़े लोगों के व्यक्तिगत बातों को जमकर सामने रखती हैं। क्या इससे इतर और कोई गंभीर मामले ही नहीं होते। जितने बड़े मीडिया घराने हैं वे एजेंडे को सेट करने में लगे हुए हैं। अमेरिका के न्यूयार्क टाइम्स और सीबीएस ऐसे मामलों के बादशाह हैं। उनका कहना है कि अधिकतर मीडिया इसी सिस्टम से जुड़े हुए हैं। संस्थानिक ढांचा भी कमोबेश उसी तरह का है। न्यूयार्क टाइम्स एक कॉरपोरेशन है और वह अपने प्रोडक्ट को बेचता है। उसका प्रोडक्ट ऑडियंस है। वे अखबार बेचकर पैसे नहीं बनाते। वे वेबसाइट के जरिए खबरें पेश करके खुश हैं। वास्तव में जब आप उनके अखबार खरीदते हैं तो वे पैसे खर्च कर रहे होते हैं। लेकिन चूंकि ऑडियंस एक प्रोडक्ट है, इसलिए लोगों के लिए उन लोगों से लिखाया जाता है तो समाज के टॉप लेवल नियतिनियंता हैं। आपको अपने उत्पाद को बेचने के लिए बाजार चाहिए और बाजार आपका विज्ञापनदाता है। चाहे टेलीविजन हो या अखबार या और कुछ आप ऑडियंस को बेच रहे होते हैं। (नोम चोमस्की)
यही कारण है कि भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को लेकर जब ‘टाइम” मैग्जीन ने कवर स्टोरी छापी और ‘वाशिंगटन पोस्ट” ने लिखा तो भारत सरकार की नींद हराम हो गई। यह मीडिया एजेंडा का ही प्रभाव था कि वैश्विक स्तर पर अपनी साख को बचाने के लिए भारत की कांग्रेस सरकार ने आनन-फानन में कई फैसले लिए। क्या इस बात से इंकार किया जा सकता है कि 1990 के दशक में जब मनमोहन सिंह भारत के वित्तमंत्री थे तो उन्होंने आर्थिक उदारीकरण का दौर लाया था और भारत अमेरिका सहित दुनिया के आर्थिक संपन्न देशों की नजरों में छा गया। यही वह समय था जब मनमोहन सिंह उस दुनिया के चहेते बन गए लेकिन आज जब पश्चिमी मीडिया ने खिचार्इं की तो फिर उन्हें कड़े कदम उठाने के लिए मजबूर हो गए।
आज के दौर में चाहे सरकार हो या विपक्ष या फिर सिविल सोसाइटी के सदस्य, हर कोई एजेंडा सेट करने में लगा है। देशद्रोह, जेएनयू, अख़लाक़, कन्हैया, रोहित बेमुला, लोकपाल, भ्रष्टाचार, आंदोलन, चुनाव, विदेशी मीडिया, कॉमनवेल्थ गेम्स घोटाला, टूजी एस्पेक्ट्रम मामला, कोयला आवंटन मामले आदि ऐसे मामले हैं जिनके जरिए विभिन्न रूपों में एजेंडे तय किए गए। क्योंकि हर मामले में चाहे न्यूज चैनल हो या फिर अखबार, हर जगहों पर जमकर बहस हुई और मीडिया की नई भूमिका लोगों ने देखा कि किस तरह आरोपी और आरोप लगाने वाले एक ही मंच पर अपनी-अपनी सफाई दे रहे हैं।
यहीं से मामला गंभीर होता जाता है कि क्या मीडिया की भूमिका एजेंडा सेट करने के लिए होती है। अभी अधिक समय नहीं बीता जब ‘पेड न्यूज” को लेकर संसद तक में हंगामा मचा था। मीडिया के पर्दे के पीछे पेड न्यूज ने किस तरह का खेल खेल रही थी, यह किसी से छुपा हुआ नहीं है। लेकिन मीडिया एजेंडा सेटिंग की ओर शायद ही किसी का ध्यान गया हो। यह मामला पहली बार अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के समय में सामने आया और इस थ्योरी को लेकर पहली बार मैक्सवेल मैकॉम्ब और डोनाल्ड शॉ ने लिखा। 1922 में पहली बार वाल्टर लिप्पमेन ने इस मामले में अपनी बात सामने रखी थी। उनके मुताबिक लोग किसी भी मामले में सीधे तौर पर अपनी प्रतिक्रिया नहीं देते बल्कि वे स्यूडो वातावरण में रहते हैं। ऐसे में मीडिया उनके लिए काफी मायने रखता है क्योंकि यह उनके विचारों को प्रभावित करता है। (वाल्टर लिप्पमेन) मालूम हो कि मैक्सवेल मैकॉम्ब और शॉ के द्वारा एजेंडा सेटिंग थ्योरी सामने रखने के बाद इस मामले पर करीब सवा चार सौ अध्ययन हो जुके हैं। वैश्विक तौर पर भौगोलिक और एतिहासिक स्तर पर यह एजेंडा कई स्वरूपों में सामने आया बावजूद इसके दुनिया में तमाम तरह के मसले हैं और तमाम तरह की खबरें भी हैं।
अभी तक एजेंडा सेटिंग के गिरफ्त में विदेशी चैनलों और अखबारों के शामिल होने की खबरें सामने आती थीं लेकिन अब भारतीय मीडिया पूरी तरह इसकी चपेट में है। अखबारों की हेडलाइंस के आकार, खबरों का आकार और प्लेसमेंट मीडिया एजेंडा का कारक होता है तो वहीं टीवी चैनलों में खबरों के पोजिशन और लंबाई उसकी प्राथमिकता और महत्ता को तय करती है। इस मामले में आनंद प्रधान लिखते हैं कि कहने को इन दैनिक चर्चाओं में उस दिन के सबसे महत्वपूर्ण खबर या घटनाक्रम पर चर्चा होती है लेकिन आमतौर पर यह चैनल की पसंद होती है कि वह किस विषय पर प्राइम टाइम चर्चा करना चाहता है। वह कहते हैं कि इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि लोकतंत्र में ये चर्चाएं कई कारणों से महत्वपूर्ण होती हैं। ये चर्चाएं न सिर्फ दर्शकों को घटनाओं व मुद्दों के बारे में जागरूक करती हैं और जनमत तैयार करती हैं बल्कि लोकतंत्र में वाद-संवाद और विचार-विमर्श के लिए मंच मुहैया कराती हैं। वह आगे लिखते हैं कि न्यूज मीडिया इन चर्चाओं और बहसों के जरिये ही कुछ घटनाओं और मुद्दों को आगे बढ़ाते हैं और उन्हें राष्ट्रीय/क्षेत्रीय एजेंडे पर स्थापित करने की कोशिश करते हैं।(आनंद प्रधान) हालांकि एजेंडे का प्रभाव तत्काल दिखाई नहीं देता, इसका प्रभाव दूरगामी भी होता है। वालग्रेव और वॉन एलिस्ट कहते हैं कि एजेंडा सेटिंग का यह मतलब नहीं होता है कि उसके प्रभाव स्पष्ट दीखने लगें बल्कि यह टॉपिक, मीडिया के प्रकार आैर इसके विस्तार के सही समुच्चय के तौर पर सामने आता है। (वालग्रेव एंड वॉन एलिस्ट, 2006)
वर्तमान में भारतीय न्यूज़ चैनलों की खबरों का विश्लेषण करें तो मैक्सवेल ई मैकॉम्ब और डोनाल्ड शॉ द्वारा जनसंचार के एजेंडा सेटिंग थ्योरी के निष्कर्ष साफ दिखाई देंगे। पिछले कुछ समय से जो खबरें प्रसारित की जा रही हैं उनके जरिए न्यायपालिका से लेकर संसदीय प्रक्रिया तक के एजेंडे तय हुए हैं। सबसे ताजातरीन मामला आरुषि हत्याकांड का है। आज के दौर में ऐसा लगता है हमारा पूरा का पूरा मीडिया एजेंडा सेटिंग के सिद्धांत में उलझकर रह गया है। ट्रायल और ट्रीब्यूनल्स को किस तरह भारतीय मीडिया पेश करते हैं, यह किसी से छुपी हुई नहीं है। इतना ही नहीं, एजेंडा सेटिंग कई तरह के प्रभाव से भी जुड़े होते हैं मसलन फायदेमंद प्रभाव, खबरों को नजरअंदाज करना, खबरों के प्रकार और मीडिया गेटकीपिंग आदि। (डेयरिंग एंड रोजर्स, 1996:15)
पिछले दिनों एक साक्षात्कार में शेखर गुप्ता मीडिया एजेंडा थ्योरी की बारीकियों को बताते हुए कहा था कि मीडिया का मूल सवाल खड़े करना है लेकिन यह एजेंडा तब हो जाता है जब आप सवाल के जरिए किसी एजेंडे को खड़े करते हैं। इन मसलों पर अब विचार नहीं किया जाता। मसलन भ्रष्टाचार के विरोध में खड़ा हुआ आंदोलन मीडिया को और व्यापक बनाते हैं। यदि मीडिया अच्छे कारणों को लेकर चल रही है और इससे समाज को बड़े पैमाने पर फायदा होगा तो इससे किसी को परेशानी नहीं होनी चाहिए। उदाहरण देते हुए वे कहते हैं कि जेंडर की समानता को लेकर चलाया गया कंपेन काफी प्रभावशाली रहा था और ‘गुड एजेंडा सेटिंग” का उदाहरण है। साक्षरता, सूचना अधिकार आदि को लेकर चलाया गया कंपेन भी इसी का उदाहरण है। (शेखर गुप्ता)
इसी मसले पर सेवंती नैनन का मानना है कि मीडिया में इतनी ताकत होती है कि वह किसी भी मसले को हमारे दिमाग में भर दे। जैसे अन्ना आंदोलन को लेकर जो नॉन स्टॉफ कवरेज टीवी चैनलों के द्वारा किया गया, इससे हर कोई यह सोचने के लिए विवश हो गया कि कौन-सा राष्ट्रीय मसला महत्वपूर्ण है। जहां तक इसके नकारात्मक पहलू की बात है तो हर किसी को चोर कह देना आैर जेल में डालने की बात कहना, गलता है। ऐसे में यह ध्यान देना चाहिए कि सब कुछ टीआरपी ही नहीं होता। (सेवंती नैनन) गौरतलब है कि वरिष्ठ पत्रकार एन. राम ने सकारात्मक पक्ष को एजेंडा बिल्डिंग का नाम दिया है और उनका कहना है लोगों को एजेंडा सेटिंग और प्रोपगैंडा के साथ एजेंडा बिल्डिंग के बीच कनफ्यूज नहीं होनी चाहिए।
मालूम हो कि एजेंडा सेटिंग तीन तरीके से होता है, मीडिया एजेंडा, जो मीडिया बहस करता है। दूसरा पब्लिक एजेंडा जिसे व्यक्तिगत तौर पर लोग बातचीत करते हैं और तीसरा पॉलिसी एजेंडा जिसे लेकर पॉलिसी बनाने वाले विचार करते हैं। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि राजनीति काफी हद तक मीडिया को प्रभावित करती है। ऐसे में मीडिया कौन-सी खबरों को तवज्जो देता है, किस खबर का न्यूज वेल्यू किस तरह आंकता है और ऑडियंस की रुचि कैसी खबरों में है, आदि बातें मायने रखती हैं और फिर खबरों के प्रसारण के बाद उन्हीं बातों पर आम लोग अपनी राय कायम करते हैं।(मैक्सवेल)
आखिर किस तरह की खबरें दिखाई जा रही हैं और किस तरह के विज्ञापन प्रसारित किए जा रहे हैं, इनकी निगरानी करने वाली संस्थाएं कहां हैं। शुरुआती दौर में एजेंडा सेटिंग के तहत समाचारों का विश्लेषण पब्लिक ओपेनियन पोलिंग डाटा के साथ किया जाता था और राजनीतिक चुनाव के दौरान इसकी मदद से काफी कुछ तय हो जाता है। यही कारण है कि नोम चोमस्की कहते हैं कि इन मामलों में पीआर रिलेशन इंडस्ट्री, पब्लिक इंटलेक्चुअल, बिग थिंकर (जो ओप एड पेज पर छपते हैं) की भूमिका पर ध्यान देना होगा। हालांकि समय के साथ मीडिया के एजेंडे में बदलाव होता रहता है और ऐसा होना लाजिमी भी है क्योंकि एक बात तय होती है कि पत्रकारों की सहभागिता के साथ-साथ आम लोग किसी खास मुद्दे पर बात करते हैं और बहस करते हैं।
नोम चोमस्की कहते हैं कि मीडिया की जो भी कंपनियां है, सभी बड़ी कंपनियां हैं और मुनाफे की मलाई काटते हैं। उनका मानना है कि निजी अर्थव्यवस्था की शीर्षस्थ सत्ता संरचना का हिस्सा होती हैं और ये मीडिया कंपनियां मुख्य तौर पर ऊपर बैठे बड़े लोगों द्वारा नियंत्रित होती हैं। अगर आप उन आकाओं के मुताबिक काम नहीं करेंगे, तो आपको नौकरी से हाथ भी धोना पड़ सकता है। बड़ी मीडिया कंपनियां इसी आका तंत्र का एक हिस्सा है। (नोम चोमस्की) ऐसे में हमें विभिन्न एजेंडों, मीडिया की प्राथमिकता, आम लोगों और कानूनविदों के बीच अंतर को समझना होगा। किस तरह की खबरों को प्रमोट किया जाता है और किस तरह खबरों से खेला जा रहा है, वह भी एजेंडा सेटिंग में मायने रखते हैं। जैसे मीडिया कभी घरेलू मामलों को छोड़कर अंतरराष्ट्रीय मामलों को तवज्जो देने लगता है या फिर घरेलू मसलों में से किसी खास मसले की खबरें लगातार दिखाई जाती हैं। (रोजर्स एंड डेयरिंग, 1987)
बहरहाल, लोकतंत्र के इस लोक में मीडिया पर बाजार का जबर्दस्त प्रभाव है क्योंकि पेड न्यूज तो पैसे कमाने का साधन मात्र था लेकिन मीडिया एजेंडा तो पूरे तंत्र को प्रभावित करने की क्षमता रखता है। इसके दायरे में सिर्फ आर्थिक संसाधन नहीं आते बल्कि पूरे लोक की सोच और समझ के साथ नियति निर्धारकों का मंतव्य भी जुड़ा हुआ है। ऐसे में जाहिर सी बात है कि मीडिया एजेंडे थ्योरी को समझना होगा और इसके जरिए पड़ने वाले प्रभाव पर भी बारीक नजर रखनी होगी।
संदर्भ:
नोम चोमस्की, 1997, http://www.chomsky.info/articles/199710–.htm
वाल्टर लिप्पमेन,http://www.agendasetting.com/index.php/agenda-setting-theory
आनंद प्रधान, 2011, http://www.tehelkahindi.com/stambh/diggajdeergha/forum/994.html
शेखर गुप्ता, 2011, http://www.campaignindia.in/Article/276406,double-standards-why-is-agenda-setting-in-media-significant.aspx
सेवंती नैनन, 2011, http://www.campaignindia.in/Article/276406,double-standards-why-is-agenda-setting-in-media-significant.aspx
डेनिस मैक्वेल, 2010, McQuail’s Mass Communication (6th ed.) Theory, pp. 513-514, Sage Publication
रोजर्स एंड डेयरिंग, 1987, ‘Agenda setting research; Where has it been? Where is it going?, in J. Anderson (ed.) Communication Yearbook 11, pp.555-94, Newbury Park. CA: Sage.’
वालग्रेव एंड वान एलिस्ट, 2006, ‘The contingency effect of the mass media’s agenda setting’, Journal of Communication, 56(1), pp. 88-109′
डेयरिंग एंड रोजर्स, 1996, Agenda Setting Thousand Oaks, CS: Sage

(लेखक एक दशक तक दैनिक भास्कर,देशबन्धुराष्ट्रीय सहारा और हिंदुस्तान जैसे अखबारों में सक्रिय पत्रकारिता करने के बाद इन दिनों जामिया मिल्लिया इस्लामिया से सोशल मीडिया पर शोध कर रहे हैं. उन्होंने माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय नोएडा कैंपसजामिया मिल्लिया इस्लामिया के अलावा दिल्ली विश्वविद्यालय के रामलाल आनंद कॉलेज में बतौर गेस्ट लेक्चरर अध्यापन भी किया है. )

3/29/2016

न्यूज़ ब्रेक करता है सोशल मीडिया

किसी भी घटना की पहली रिपोर्ट जो पुलिस दर्ज करती है, वह एफआईआर यानी फस्र्ट इनफार्मेशन रिपोर्ट कहलाती है। इस रिपोर्ट में किसी भी घटना की बारीक जानकारी होती है, जो प्रभावित व्यक्ति दर्ज कराता है। उसी तरह वर्तमान समय में सोशल मीडिया तमाम मुख्यधारा की मीडिया के लिए एफआईआर का काम करती है और आज फेसबुक के पोस्ट, स्टेट्स और ट्विटर की ट्वीट से खबरें ब्रेक होने लगी है और बनने लगी है। पहली खबर सोशल मीडिया में फ्लैश होते ही उसे लेकर रिपोर्टर रिसर्च करता है, छानबीन करता है, संबद्ध लोगों से बातचीत करता है और फिर पुख्ता खबर अखबारों में जहां प्रकाशित होता है, वहीं न्यूज चैनलों पर प्रसारित होता है।
त्रासदियों को करें याद
याद करें उत्तराखंड में आई भीषण त्रासदी को, या फिर नेपाल और बिहार में आए भूकंप को, तमाम अखबार और न्यूज चैनलों ने खबरें जानने और प्रसारण करने के लिए इन्हीं सोशल मीडिया का सहारा लिया। यहां तक कि मीडिया के इन माध्यमों में जो तस्वीरें या वीडियो दिखाए गए, वे इन्हीं सोशल मीडिया से लिए गए थे। अब तो प्रधानमंत्रियों सहित केंद्र सरकार के तमाम मंत्री प्रेस कांफ्रेस करना तक भूल गए हैं और वे लोगों को तमाम जानकारी सोशल मीडिया के तमाम प्लेटफार्म के जरिए दे रहे हैं। गौरतलब है कि अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने विदेशी प्रवास पर किसी मीडियाकर्मी को नहीं ले जाते लेकिन उनके फेसबुक और ट्विटर एकाउंट पर दी गई जानकारी और फोटो सुर्खियां बनती हैं।
नोकझोंक बनती हैं सुर्खियां
यह सिर्फ केंद्र सरकार की कार्य पद्धति नहीं है बल्कि राज्यों में पक्ष और विपक्षी नेताओं की नोकझोंक भी इन्हीं सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफार्म पर चलती रहती है। यहां तक कि किसी खिलाड़ी के मैच या पदक जीतने पर तमाम नेता सोशल मीडिया के माध्यमों से बधाई देते हैं और वे तमाम मीडिया में सुर्खियां पाती हैं। किसी फिल्म का फस्र्ट लुक भी अब इन्हीं सोशल मीडिया में पहली बार आता है। फिल्म अभिनेता और निर्माता अपनी फिल्मी का प्रचार-प्रसार के लिए इन्हीं माध्यमों का सहारा लेते हैं। इसके अलावा, अपनी व्यक्तिगत जानकारियां और तस्वीरें भी यहां पोस्ट करते हैं। इतना ही नहीं, किसी अखबार में उनके बारे में या फिर कोई और जानकारी प्रकाशित होने पर वे विरोध भी दर्ज कराते हैं। मसलन दीपिका पादुकोण और उनके अंगों को लेकर टाइम्स ऑफ इंडिया में प्रकाशित खबरों को लेकर दीपिका पादुकोण ने कैसी प्रतिक्रिया जाहिर की थी और सोशल मीडिया पर कैसी लताड़ लगाई थी, यह किसी से छुपी हुई नहीं थी। वहीं, दीपिका की फिल्म ‘माई च्वाइस’ का यूट्यूब पर प्रसारण और फिर इसके बाद सामाजिक परिदृश्य में पक्ष और विपक्ष में बहस ज्यादा पुरानी नहीं है।
(पूरा आलेख पढ़ने के लिए क्लिक करें http://www.newswriters.in/2016/03/29/breaking-news-on-social-media/)

2/07/2016

संचार के पारंपरिक दुर्ग में सेंध

सोशल मीडिया/ विनीत उत्पल

सोशल मीडिया एक तरह से दुनिया के विभिन्न कोनों में बैठे उन लोगों से संवाद है जिनके पास इंटरनेट की सुविधा है। इसके जरिए ऐसा औजार पूरी दुनिया के लोगों के हाथ लगा है,जिसके जरिए वे न सिर्फ अपनी बातों को दुनिया के सामने रखते हैंबल्कि वे दूसरी की बातों सहित दुनिया की तमाम घटनाओं से अवगत भी होते हैं। यहां तक कि सेल्फी सहित तमाम घटनाओं की तस्वीरें भी लोगों के साथ शेयर करते हैं। इतना ही नहींइसके जरिए यूजर हजारों हजार लोगों तक अपनी बात महज एक क्लिक की सहायता से पहुंचा सकता है। अब तो सोशल मीडिया सामान्य संपर्कसंवाद या मनोरंजन से इतर नौकरी आदि ढूंढ़नेउत्पादों या लेखन के प्रचार-प्रसार में भी सहायता करता है।
साझी चेतना पैदा करता है सोशल मीडिया
न्यूयार्क विश्वविद्यालय में न्यू मीडिया के प्रोफेसर क्ले शर्की का मत है कि सोशल मीडिया की सबसे बड़ी क्रांति शक्ति यह यह है कि यह जनता के यथार्थ और निजी जिंदगी में साझी चेतना पैदा करता है। स्टेट के पास निगरानी के चाहे कितने भी संवेदनशील उपकरण हों लेकिन अब राज्य का सामान्य नागरिक भी अपने संसाधनों का प्रयोग स्टेट के विरुद्ध कर सकता है। वहींजेसन एबट ने अपने शोधपत्र में यह स्थापित किया है कि सोशल नेटवर्किंग साइट और नवीन तकनीकी कम्युनिकेशन का केवल नया रूप मात्र नहीं है अपितु एक्टिविस्टनागरिकों और सामाजिक आंदोलनों को जन-जन तक पहुंचाने का अद्भुत अवसर उपलब्ध कराता है।
अब प्रेस कांफ्रेंस से दूरी
इस माध्यम का सकारात्मक पहलू यह है कि अब भारत जैसे देश में प्रधानमंत्री सहित तमाम केंद्रीय नेता या अफसर मीडिया को संबोधित करने के लिए प्रेस कांफ्रेंस न कर सोशल मीडिया का इस्तेमाल करते हैं। चुनाव लड़ने में और अपनी बात सार्वजनिक तौर पर कहने में ये माध्यम काम आते हैं। पार्टी जनता से पूछती है कि सरकार बनाए या नहीं। सोशल मीडिया की ताकत का ही परिणाम है कि विश्वभर में राजनीतिक नसीब लिखने के लिए इसका सहारा लिया जाता है। दिल्ली विधानसभा चुनाव में पहली बार प्रजातंत्र की परिभाषा जमीन पर दिखाई दी क्योंकि अरविंद केजरीवाल ने बहुतम ने मिलने पर कांग्रेस का समर्थन को स्वीकार करने के लिए जनता के निर्णय को जानने के लिए सोशल मीडियाइंटरनेट और एसएमएस का सहारा लिया तो सोशल मीडिया का लोकतंत्र में अनोखा प्रयोग था। हालांकि इसके कई नकारात्मक पहलू भी हैंमसलन प्राइवेसी। या फिर किसी के खिलाफ प्रोपेगैंड फैलाना या फिर गलत सूचनाओं का प्रसार। कुछ लोग इसका बेजा फायदा भी उठाते हैं।
हर हाथ में मीडिया
इंटरनेट की यह सुविधा कंप्यूटरलैपटॉपस्मार्टफोन में से किसी भी उपकरण के जरिए ली जा सकती है। जीमेलयाहूरेडिफ जैसी परंपरागत ई-मेल सुविधा प्रदाता वेबसाइटों के साथ-साथ इस नेटवर्किंग में बड़ी भूमिका फेसबुकट्विटरमाई स्पेस जैसी साइटों की हैजिन्हें सोशल नेटवर्किंग साइट कहा जाता है। यूजर इन प्लेटफार्म पर अपना प्रोफाइल बनाकर अपने मित्रों और संबंधियों से संपर्क कर सकता है और नए लोगों से परिचय भी कर सकता है।
सिर्फ सोलह साल में बदला संचार
सोशल मीडिया के आने की क्रांति महज एक-डेढ़ दशक पुरानी है। सारा मामला 2000 के बाद यानी इक्कीसवीं सदी का है। शुरुआती सोशल नेटवर्किंग साइट फ्रेंडस्टर 2002 में आई थी और ट्राइब 2003 में शुरू हुई। लिंक्डइन और माइस्पेस 2003 में आई और माइस्पेस इस लिहाज से सफल पहल कहा जा सकता है। फेसबुक की शुरुआत फरवरी 2004 में हुई और इसने क्रांति कर दी। जुलाई 2010 में इसके पंजीकृत यूजर 50 करोड़ हो गए। जीमेल ने बहुप्रचारित गूगल बज’ सेवा फरवरी  2010 में शुरू हुई जबकि निंग भी 2004 से काम कर रही है। हालांकि सोशल मीडिया का असली खेल 2005 से शुरू हुआ और वर्ष 2008आते-आते अमेरिका में 35 फीसदी वयस्क इंटरनेट यूजर किसी न किसी सोशल नेटवर्किंग साइट पर अपनी प्रोफाइल बना ली और 18-24 साल आयुवर्ग में तो यह आंकड़ा 75 फीसदी तक पहुंच गया। ट्विटर ने अपने शुरुआती पांच साल में ही बीस करोड़ से अधिक यूजर को जोड़ा।
सदुपयोग और दुरुपयोग दोनों
सोशल मीडिया जिस तरह युवाओं को खासकर लुभा रहा हैऐसे में जाहिर सी बातें हैं कि उसका एक ओर सदुपयोग हो रह है तो दूसरी ओर उसका दुरुपयोग भी। आज सिर्फ अपने नेटवर्क को स्थापित करने के लिए लोग इसका इस्तेमाल नहीं कर रहे बल्कि अपनी बातों को रखनेसमर्थन या प्रतिरोध के तौर पर भी कर रहे हैं। इसके जरिए लेखन का विस्तार,अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और पाठकों की प्रतिक्रिया भी सामने आती है और पक्ष या विपक्ष के विचार भी सामने आते हैं। वहींअपनी बात कहने के लिए ना तो किसी धन या संसाधन की जरूरत हैन ही स्थापित एवं औपचारिक मीडिया संस्थानों की चिरौरी करने की। किसी भी द्वंदात्मक प्रजातंत्र में मुद्दे पहचाननाउन पर जन-मानस को शिक्षित करना और इस प्रक्रिया से उभरे जन-भावना के मार्फत सिस्टम पर दबाव डालना प्रजातंत्र की गुणवत्ता के लिए आवश्यक है।
संवाद का नया विकल्प
एक ओर जब मुख्यधारा की मीडिया की विश्वसनीयता हर रोज कटघरे में खड़ी होती हैवैसी परिस्थिति में सोशल मीडिया आम जनमानस के लिए संवाद के नए विकल्प के तौर पर सामने आया है। यही कारण है कि न सिर्फ नेता बल्कि अब तो अभिनेता भी अपनी खुद की जानकारीअपनी फिल्मों की जानकारी भी सोशल मीडिया के माध्यम से देने लगे हैं। फिल्म के टीजर से लेकर फस्र्ट लुक तक पहले सोशल मीडिया में आते हैं,बाद में संचार के दूसरे माध्यमों में प्रकाशित और प्रसारित होते हैं।
अनगिनत सूचनाओं का प्रवाह
अब तो लोग अपने जन्मदिन से लेकर मृत्यु और यहां तक की शादी की जानकारी भी इन्हीं सोशल मीडिया के प्लेटफार्म पर उपलब्ध कराते हैं। यह जानकारी सिर्फ आमलोग ही नहीं देते बल्कि समाज में एक मुकाम हासिल करने वाले लोग भी देते हैं। मसलन पिछले दिनों मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह की शादी अमृता राय के साथ होने के बाद अमृता राय ने अपने फेसबुक एकाउंट के जरिए इस बात की जानकारी दी। उन्होंने अपने पोस्ट में साफ-साफ लिखा कि हिंदू रीति-रिवाजों के साथ दिग्विजय सिंह से शादी कर ली। इतना ही नहींसोशल मीडिया के जरिए उन्होंने अपने आलोचकों को भी लताड़ा और कहा कि जिन्हें प्यार के बारे में कुछ पता नहीं उन्होंने सोशल मीडिया पर मुझे शर्मशार करने का प्रयास किया। लेकिन मैं चुप रही पर और मैंने खुद पर और अपने प्यार पर भरोसा बनाए रखा। वहींजब एम्स में पढ़ाई कर रही खुशबू ने रैगिंग से परेशान होकर खुदकुशी कर ली तो पुलिस ने उसके फेसबुक एकाउंट से लेकर व्हाट्सअप स्टेटस तक की जानकारी हासिल की और पता चला कि उसने कुछ ही दिन पहले लिखा था जिंदगी कई परेशानी दिखाती है लेकिन मौत उसका हल नहीं।
हैकर्स से परेशानी
दूसरी ओर इस मीडिया के नकारात्मक पहलू भी हैं और इसके जरिए जहां एक ओर माना जाता है कि यह समय की बर्बादी करता हैवहीं भले ही यह सोशल मीडिया हो लेकिन यह बगल में बैठे लोगों से आपको दूर भी करता है। वहीं हैकर्स के कारनामों के कारण आम आदमी के साथ-साथ महानायक तक भी परेशान रहते हैं। बॉलीवुड अभिनेता अमिताभ बच्चन ने उन अभद्रअश्लील एसएमएस के बारे में मुंबई पुलिस से शिकायत दर्ज कराई थी,जो उन्हें पिछले वर्ष से भेजे जा रहे हैं। 72 वर्षीय अभिनेता ने जुहू पुलिस थाने के वरिष्ठ पुलिस निरीक्षक को संबोधित पत्र में मामले की जांच करने और दोषियों पर कार्रवाई करने का अनुरोध किया था। इससे पहले उन्होंने कहा था कि उनका ट्विटर एकाउंट हैक हो गया है और कुछ लोगों ने मुझे फॉलो करने वाले लोगों की सूची में अश्लील साइटें डाल दी हैं। जिसने भी यह किया हैमैं उसे बता देना चाहता हूं कि मुझे इसकी कोई जरूरत नहीं है।
जाहिर सी बात है कि सोशल मीडिया के पक्ष में और विपक्ष में कई बातें हैं जो रोज घट रही हैं। उनके फायदे हैं तो नुकसान भी हैं।
(लेखक एक दशक तक दैनिक भास्कर,देशबन्धुराष्ट्रीय सहारा और हिंदुस्तान जैसे अखबारों में सक्रिय पत्रकारिता करने के बाद इन दिनों जामिया मिल्लिया इस्लामिया से मीडिया पर शोध कर रहे हैं. वे माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय नोएडा कैंपसजामिया मिल्लिया इस्लामिया के अलावा दिल्ली विश्वविद्यालय के रामलाल आनंद कॉलेज में बतौर गेस्ट लेक्चरर अध्यापन भी किया है. )
courtesy: http://uoujournalism.blogspot.in/2016/02/blog-post_57.html

10/09/2015

पत्रकारिता एवं संचार की कुछ किताबें


1. पत्रकार एवं पत्रकारिता प्रशिक्षण- अरविंद मोहन
2. कॉरपोरेट मीडिया दलाल स्ट्रीट- दिलीप मंडल
3. मीडिया का अंडरवल्र्ड- दिलीप मंडल
4. हिंदी में समाचार- अरविंद दास
5. उबेर्तो इको-चिह्नशास्त्र, साहित्य और मीडिया- जगदीश्वर चतुर्वेदी
6. वैकल्पिक मीडिया, लोकतंत्र और नॉम चोमस्की- जगदीश्वर चतुर्वेदी, सुधा सिंह
7. पटकथा लेखन- मनोहर श्याम जोशी
8. वेब पत्रकारिता- शालिनी जोशी, शिव प्रसाद जोशी
9. सोशल नेटवर्क- संजय द्विवेदी
10. न्यू मीडिया- आर.अनुराधा
11. संचार शोध प्रविधियां- डॉ. संजीव भानावत
12. ब्रेकिंग न्यूज- पुण्य प्रसून वाजपेयी
13. जनसंचार सिद्धांत और अनुप्रयोग- विष्णु राजगढ़िया
14. हिंदी पत्रकारिता का इतिहास दिल्ली- लाल बहादुर ओझा
15. टेलीविजन और अपराध पत्रकारिता- वर्तिका नंदा
16. मीडिया शोध-डॉ.मनोज दयाल
17. मीडिया, भूमंडलीकरण और समाज- संजय द्विवेदी
18. फोटो पत्रकारिता-नवल जायसवाल
19. खबर पर नजर- राघवेंद्र पाठक
20. समाचार का भाषा विज्ञान-रमेश कुमार वर्णवाल

10/06/2015

The important mass communication books

Mass Communication
1.       Mass Communication Theory- Denis McQuail
2.       Mass Communication Thechnology-Uma Narula
3.       Mass Communication Theory & Practice-Uma Narula
4.       Dynamics of Mass Communication – Uma Narula
5.       Communication Prospectives- Uma Narula
6.       Communication Model- Uma Narula
7.       Handbook of Communication- Uma Narula
8.       Communication Theory- Wikibooks
9.       Globalization, Development & The mass Media-Colin Sparks
10.   Development as Freedom-Amartya Sen
11.   Communication Theory, Media, Technology & Society-David Holmes
12.   Communication Theory & Research-Bens & Golding
13.   Mass Communication Theory, Foundation, Ferment & Future- Baron & Devis
Mass Communication and Journalism
14.   Handbook of Journalism and Mass Communication – Vir Bala Aggarwal & V.S.Gupta
15.   Mass Communication in India- Keval J. Kumar
16.   Mass Communication-Seema Hasan
17.   Mass Communication & Journalism in India- D.S.Mehta
18.   Growth and Development of Mass Communication in India – J.V.Vilanilam
19.   The Art of Editing-Floyd K.Baskette & Jack Z. Sissors
20.   The Journalist Handbook- M.V.Kamath
21.   21st Century Journalism in India-Nalini Ranjan
Public Relation
22.   Public Relation in India-J.V.Vilanilam
23.   Evaluating Public Relation –Yom Watson & Paul Noble
24.   Introducing Public Relation – Keith Butterick
Advertising
25.   Advertising basics – J.V. Vilanilam & A.K. Varghese
26.   Advertising Principles & Practice – William D. Wells, John Burnety & Sandra Moriarity
27.   Advertising- Frank Jefkins
Research
28.   Doing your Research Project- Zino O’Leary
29.   Research Methodology-C.R.Kothari
30.   Handbook of Communication Research-Dr. Devesh Kishore
31.   Mass Communication Research- Wimmer & Domnick
32.   A handbook of Media & Communication Research-Klaus Bruhn Jensen
Statistics
33.   Statistics & Research- George Argyrous
34.   Discovering Statistics using IBM SPSS Ststistics-Field
35.   Probability & Statistics-D.Biswas
Media Laws
36.   Media Ethics- Paranjoy Guha Thakurta
37.   Media Law Ethics- M. Neelamalar
38.   Media Ethics-K.M.Shrivastava
39.   Mass Media Laws and Regulations-C.S.Rayadu & S.B.Nageswar Rao
40.   The Media Self Regulation Guidebook-OSCE
41.   The Ethical Journalism-Tony Harcup
42.   The Handbook of Mass Media Ethics-Wilkins & Christians
Development Communication
43.   Communication for Development in the Third World-Srinivas R.Melkote & H.Leslie Steeves
44.   Involving the community (A guide to participatory development communication)-Guy Bessette
45.   Communication for Development & Social Change-Jan Servaes
46.   Communication and Sustainable Development-Jam Servaes & Patchance Malikhao
Film Studies
47.   Director’s Cut- M.K. Raghavendra
48.   Understanding Media- Waren Buckland
49.   Beginning Film Studies- Andrew Dix
Television
50.   Handbook of Television Production-Herbert Zettl
Others
51.   The Indian Media Business- Vanita Kohli Khandekar
52.   Media Analysis Techniques – Arthur Asa Berger
53.   Communication, Technology & Development-I.P. Tiwari