9/15/2022

मैथिली लोक साहित्य में भारत बोध



मैथिली लोक साहित्य में भारत बोध

डॉ. विनीत उत्पल 

सहायक प्राध्यापक 

भारतीय जन संचार संस्थान, 

जम्मू परिसर 

मैथिली लोक साहित्य में लोकमंगल रचा-बसा है. समाज की विविधता, समाज का ताना-बाना, समाज की समरसता, सामूहिकता की संस्कृति, लोकजीवन के तमाम पहलुओं आदि परंपरा मैथिली साहित्य में है. लोकजीवन की गति, लय और समय की दुधारी तलवार के तमाम रेखांकित किये जाने वाले विषय मैथिली साहित्य में बखूबी दिखाई देते हैं. गांव की ताकत, ग्रामीण परिवेश का अपनापन, लोक उत्सव में सामूहिकता का ताना-बाना, परंपरा की पहचान, पारम्परिक प्रतीक, समाज-सापेक्ष दृष्टिकोण, लोक विडम्बना का चित्रांकन भी साहित्य में नजर आती है. 



मैथिली लोक साहित्य में परंपरागत विद्या केंद्र, जहाँ साहित्य के आस्वादन और ज्ञान की जिज्ञासा में लोक लिप्त रहते हैं.

मिथिला लोक में राजा के दरबार में ज्ञान की ज्योति बहती रही है. समाज के सभी वर्ग के लोक में उच्च श्रेणी के विचारक होते

रहे हैं. इसका प्रमाण महाभारत के वन पर्व में धर्मव्याध और पतिव्रता साध्वी की कथा के तौर पर देखा जा सकता है. यहाँ के

लोक की ताकत ही है कि भारतीय दर्शनशास्त्र के छह में से चार शाखा, गौतम न्याय, कणाद वैशेषिक दर्शन, जैमिनी

मीमांसा और कपिल सांख्य की स्थापना इसी मिथिला में हुई. 

छह से तेरह शताब्दी ईस्वी पूर्व मिथिला के सीमा से सटा वैशाली बौद्ध मत का केंद्र बना और कुमारिल भट्ट के साथ

उदयनाचार्य वैदिक परंपरा को मिथिला लोक में स्थापित किये. मैथिली के मूर्धान्य विद्वान जयकांत मिश्र के अनुसार, जिस दौर

में मुसलमान भारतीय परम्परा को चोट पहुंचा रहे थे तब मिथिला के लोक में बेस तमाम विद्वान सामाजिक और नैतिक नियम

का निर्माण कर रहे थे. यही कारण था कि मध्ययुग के दौरान मिथिला में नव्यन्याय, पूर्व मीमांसा और स्मृति निबंध में काफी

संख्या में रचना की गई. 

मिथिला के लोक में एकदेशीय धर्म का स्वरूप रहा है और हिन्दू वर्णाश्रम धर्म में विश्वास रहा है. यहाँ के लोक में शिव, शक्ति

और विष्णु को मानने की परंपरा रही है, परन्तु यहाँ महादेव की पूजा व्यापक रूप में प्रचलित है. यही कारण है कि विद्यापति

से लेकर चंदा झा तक शिव संबंधी गीतों की रचना की. यहाँ उल्लेखनीय है कि भगवान शिव की स्तुति दो रूपों में की जाती है,

पहला ‘नचारी’ और दूसरा ‘महेशवाणी’। ‘नचारी’ शुद्धरूप में भक्तिगीत होता है, वहीं ‘महेशवाणी’ में महादेव और गौरी के

विवाहित जीवन पर आधारित गीत होते हैं.     मिथिला लोक में समाज समावेशी है. यहाँ के ब्राह्मण लोक की उपाधि ‘खां’,

‘बख्शी’ और ‘चौधरी’ होते हैं और मुसलमान रामकृष्ण की भक्ति गीत गाते हैं.

मिथिला लोक की दिशा समरसता से लेकर लोकरसता तक जाती है. यहाँ के लोक साहित्य के मुख्य पात्र बहुतायत में समाज

के निचले वर्ग के लोग हैं. सलहेस, लोरिक, मनियार, कारिख पँजियार, दीनाभद्री, कारू खिरहरि, केवल महाराज, अल्हा-ऊदल,

भीम केवट, बहुरा गोढ़िन, सकना दानवाह, राक कामत, चूहड़मल, पीरबख्श, रन्नू सरदार, जीबछ कमार, लल्लू पटवारी,

जयमलाह, सीसिया महाराज, गरीबन बाबा, सोनाय महाराज, घोघन दिरुवाह, अकलू बड़घरिया, घुमन गुरु,खेदन महाराज,

हंकरु गोसाईं, प्रयाग दासी, छेछन डोम आदि हैं. यहाँ भारत बोध इतना प्रबल है कि मिथिला लोक सिर्फ इन्हें गाथा नायक ही

नहीं मानते बल्कि सत्य पर आधारित पात्र मानते हैं. 

मिथिला लोक कविता में राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ-साथ राजनीतिक कुटिलता, आर्थिक विषमता और संकटमय जीवन के

अनुभव में नैराश्य, असंतोष आदि के स्वर को भी शब्द दिए गए हैं. यात्री के बाद राजकमल चौधरी, रामकृष्ण झा किशुन,

सोमदेव और धीरेन्द्र जैसे कवि ने समाज और राजनीतिक लोक पर बखूबी लेखन किया है. मिथिला लोक शहरी लोक से अलग

सामजस्य का लोक रहा है, तभी तो लोक के लिए कहा जाता है, 

“घरे पर घर मकाने पर मकान, नहि रास्ता केर ठिकान, नहि नाली मौड़िक निकाशीये अछि, एकक दलान तँ दोसर केँ

पिछुआड़, तेसरक बथान तें चारिमक बाड़ा-आमने-सामने होयत अछि.”    

(एक घर से सटा दूसरे का मकान होता है, कोई रास्ता नहीं होता, नाली यही होती, एक के दरवाजे पर दूसरे के घर के पीछे के

हिस्सा होता है. वहीं तीसरे का बथान होता है और चौथे का मवेशी बांधने की जगह होती है.) हालाँकि साहित्य में इस लोक

संस्कृति को अच्छी दृष्टि से नहीं देखा जाता जबकि अधिकतर ग्रामीण परिवेश में ऐसी सामाजिक बनावट मौजूद है. 

मिथिला लोक साहित्य में गांव को अहमियत दी गई है. यहाँ शहर से दूर ग्रामीण परिवेश सबको भाता है. हालाँकि वे विदेशी

आयात और देशी निर्यात से खुश नहीं है लेकिन पलास के फूल उन्हें भाते हैं. लोक बोध में उन्हें कचनार, कैक्टस, मनीप्लांट,

पीपल आदि में पेड़-पौधे अपने लगते हैं. मिथिला का समाज कृषि प्रधान समाज है और साहित्य में कृषि से जुड़ी रचना की

प्रधानता है. लोक साहित्य में किसानों के परिश्रम को बखूबी उकेरा गया है, जैसे, छात्रानन्द सिंह झा लिखते हैं,  

“लप-लप करैत दुपहरियामे/बाल-वृद्ध वणितागण/निज स्वेदक बुन्ना-बुन्नीमे/अछि करैत काज/”

(भीषण दोपहर में/बच्चे-बुजुर्ग सभी/अपने पसीने की बूंद-बूंद में/कर रहे हैं काम) 

यह लोक ही तो है जहाँ खेती के लिए बच्चे और बुजुर्ग कंधा-से-कंधा मिलकर एक साथ धरती को उपजाने का कार्य करते हैं

और भारत बोध यही तो है. युवा कवि अंशुमान सत्यकेतु अपनी कविता ‘मनुक्ख आशावादी होइत अछि’ में लिखते हैं, 

“मुदा जखन/ हमर पएर रहैत अछि तबधल/ खेतक माटिपर/आब’ लगैत अछि हमर घाममे/सोन्हगर गन्ह/”

(लेकिन जब/ मेरे पैर रहते हैं गंदे /खेत की मिट्टी पर/तब आता है मेरे पसीने से/ सुगन्धित खुशबू)

मतलब, मिथिला लोक साहित्य में पसीने के गंध में भी रचनाकार एक तरह का खुशबू पाता है.

दीनानाथ पाठक ‘बंधु’ लिखते हैं, “करू सब गामक जयजयकार/ बसल प्रकृति केर रम्य कोर मे. रहथि लोक सब लीन मोद मे/

मुक्त वायु-मंडल प्रसन्न मन/”

(करे सभी गांव का जयजयकार/ बसा हुआ है प्राकृत के रमणीक गोद में/ रहते हैं सभी लोग मस्ती में/ खुली हवा में प्रसन्न मन में)

मिथिला का लोक ग्राम प्रधान है. भारत बोध का भी यही आधार है. कृषि कर्म की प्रधानता है. लोक इसी कर्म में लगे होते हैं.

कर्म से आशा जगती है और आशा के जागने से निराशा भागती है. मिथिला लोक इस कदर आशावादी है कि भूकंप और बाढ़

की त्रासदी झेलने के बाद भी उसे आशा है कि एक-न-एक दिन उनके समय पलटेंगे. समाज की विषमता दूर हो भारत बोध के

लिए समाज आगे आएगा. लोक एक संग होंगे. एक-दूसरे के सुख-दुःख को बाँटेंगे. सभी का जीवन संतुष्ट होगा. अँधियारा से

उजाला आएगा. तभी तो भारत बोध को लेकर रामकृष्ण झा ‘किसुन’ अपने कविता ‘उग रहा सूरज…. में लिखते हैं, “मिटेगा या

विषमता/ सब एक होंगे आज के मानव/ की बस अब एक-से सुख दुःख बंटेंगे/ सभी होगें सुखी और संतुष्ट जीवन/ रह न पायेगा

कहीं कोई कभी अब/ मनुज विह्वल. वस्त्रहीन, विपन्न/ या कि निर्धन, निरानन्द, निरन्त” 

कवि भी भारत बोध को समझते हैं कि जब विषमताएं मिटेंगी तो लोक में रहने वाली सभी के दुःख दूर होंगे और लोक का

दायरा तभी व्यापक होगा.  मिथिला के लोक और लोक साहित्य में अपनत्व भावना, एक-दूसरे के दुःख में सहायता के लिए

तत्पर रहने की प्रवृति को उद्धृत किया गया है. वह चाहे उपेंद्र ठाकुर ‘मोहन’ की रचना हो या फिर धूमकेतु की. हालाँकि वहीं,

भारत बोध के रास्ते में आने वाले विसंगतियों को दृष्टिगोचर करते हुए मैथिली लोक साहित्य में रचना हुई है.  ऐसे में रामानन्द झा

‘रेणु’, मोहन भारद्वाज आदि प्रमुख नाम हैं. 

मैथिली लोक उत्सव का लोक है. मैथिली लोक आनंद का लोक है. मैथिली लोक पर्व का लोक है. मैथिली लोक भारत बोध का

लोक है. मैथिली लोक साहित्य में होली, दीवाली जैसे पर्वों पर प्रचूर मात्रा में लेखन किया गया. साहित्य अकादेमी से पुरस्कृति

कवि विभूति आनंद की पंक्ति है, 

“”भए जेल होलिकादहन आइ/जरि जेल प्रकृति केर शुष्क पात/जरि गेल संवत्तक राति सेहो/जरि जेल बुढ़ारिक जीर्ण गात/जरि

जेल जीवनक सकल कलेश/छन्हि बनल प्रकृति केर नवल भेस”

(हो गया होलिकादहन/जल गए प्रकृति के सूखे पत्ते/जल गए संवत्त भी रात में/जल गए पुराने हो चुके गात/जल गए जीवन के

सभी क्लेश/बना हुआ है प्रकृति का नया वेश)

जाहिर-सी बात है कि मैथिली लोक में प्रकृति तत्व है. लोक साहित्य में प्रकृति है और इसी में गंगा, यमुना, करेह, जीवछ, कोसी,

कमला, बागमती, गंडक, महानंदा आदि पर आधारित रचना है. मिथिला की उपनदी छोंछिया, सुरगवे, कल्हुआ धार, दुलार

धार दाई आदि पर केंद्रित रचना भी है. अलौकिक रूप में नदी आराध्य है, देवी तुल्य है, वहीं लौकिक रूप में क्रोध, वैमनस्य,

प्रतिशोध, विद्रोह, प्रेम, सहयोग, वात्सल्य, उपकार, मानवीय धर्म आदि देखने को मिलता है. 

मिथिला लोक में नव विवाहिता के लिए सुहागन बने रहने की कामना की जाती है. मिथिला की स्त्रियां वट-सावित्री पूजा धूम-धाम

से मनाती हैं. मिथिला लोक चैत्र शुक्ल पक्ष नवमी पुरुषोत्तम राम और भद्रा कृष्णपक्ष अष्टमी भगवान श्री कृष्ण का जन्मोत्सव

काफी धूमधाम से मानता है. यहाँ के लोक साहित्य में कुछ यूँ गीत गाये जाते हैं, 

“अहाँ राम कहू/चाहे श्याम कहू/दर्शन करबा लेल नयन तरसैए/अवध बिहारी/मथुरावासी/दुनू नाम सुमरि लिअ/भावसँ सब

मुक्ति चाहैए/गर मे माला/पिताम्बर धारी/रङ्ग दुनू के कारी, नयन देखए चाहैए”

(आप राम कहें/ या श्याम कहें/ दर्शन करने के लिए तरस रही हैं आँखें/अवध बिहारी/मथुरावासी/दोनों नामों को करे स्मरण/

भाव से यदि चाहते हैं होना मुक्त/गले में माला/पिताम्बर धारी/दोनों के रंग है श्यामला, देखना चाहती हैं आँखें).

मैथिली लोक में “”जुड़-शीतल’”, भद्र शुक्लपक्ष चौठ में “चौरचन”, भाद्र शुक्ल पक्ष चतुर्दशी को “अनंत पूजा”, अश्विन शुक्ल दशमी

को “विजया दशमी”, अश्विन पूर्णिमा को “कोजगरा”, कार्तिक अमावस्या को “दीयाबाती” जैसे पर्व भारतबोध के साथ सामूहिक

तौर पर धूम-धाम से मनाये जाते हैं. किसुनजी, चन्द्रनाथ मिश्र अमर, विभूति आनंद, शंकर कुमार चौधरी, राजकमल चौधरी,

गोपालजी झा ‘’गोपेश’ , मार्कण्डेय प्रवासी, उपेंद्र ठाकुर ‘मोहन’, भोलानाथ झा ‘धूमकेतु’’, मोहन भारद्वाज जैसे लोक रचनाकार

की कविताएं इस मिथिला लोक के बोध को बखूबी दर्शाती हैं. 

भाई-बहन के प्रेम को मिथिला लोक के काफी महत्त्व दिया गया है और इसे किसी भी तरह बाजार ने ‘रक्षाबंधन’ की तरह

प्रभावित नहीं किया है. दीपावली के बाद कार्तिक शुक्ल पक्ष द्वितीया तिथि को काफी महत्त्व दिया गया है. इसे भाई-बहन के

प्रेम का पर्व माना गया है. लोक साहित्य में लिखी अधिकतर कविता इस पर्व पर आधारित है. युवा कवियित्री स्वाती शाकम्भरी

लिखती हैं, 

“सामा-चकेवा/भातृ-द्वितीया/आ अब तें/रक्षा बंधन सेहो/अद्भुत होइत अछि/संबंध भाई-बहिनक/गरीब हो वा धनिक/बाल हो वा

किशोर/बूढ़ हो वा जुआन/भाई बहिनक बीच/अनुपम संबंधक सम्मान।”

(सामा-चकेवा/ भातृ-द्वितीया/ और अब तो/रक्षा बंधन भी/अद्भुत होता है/संबंध भाई-बहन का/गरीब हो या धनी/बाल हो या

किशोर/बूढ़ा हो या जवान/भाई-बहन के बीच/होगा है अनुपम संबंध का सम्मान)

मतलब, मिथिला लोक और लोक साहित्य में संबंधों का सम्मान अनुपम है, बेजोड़ है. स्वाती शाकम्भरी लिखती हैं कि इन तीनों

पर्वों पर मिथिला की भाई और बहन शुभ योजना बनाते हैं और बहन सभी भाइयों के कुशल रहने की कामना करती हैं. 

सामान्य लोक में कहावत है कि उगते सूरज को सभी प्रणाम करते हैं, डूबते को नहीं. मिथिला को लोक इस कहावत से दूर है

और भारत बोध के कल्पना को साकार करते हुए डूबते और उगते सूर्य को पूजता है. कार्तिक शुक्ल षष्ठी को सूर्य की आराधना

‘छठ’ पर्व के रूप में करता है. मिथिला लोक में मकर संक्रांति को ‘तिला संक्रांति’ पर्व के रूप में मनाया जाता है. 

मिथिला लोक आशा का लोक है, चेतना का लोक है, विश्वास का लोक है. भारत बोध का लोक है. आरसी प्रसाद लिखते हैं, 

“उठू-उठू हे भारत प्रहरी/जागू भारत-भक्त/नहि स्वतंत्रता क्यो पबैत अछि/बिना चढ़ौने रक्त” 

(उठो-उठो भारत के प्रहरी/जागो भारत भक्त/कोई नहीं पाता है स्वतंत्रता/बिना चढ़ाए रक्त). 

आरसी प्रसाद की कल्पना में भारत बोध संघर्ष की बात करता है. देश पर मर-मिटने की बात कहता है. देश के लिए जान

न्योछावर कहता है. कीर्तिनारायण मिश्र अपनी कविता में भारत बोध का चित्रांकन करते हुए लिखते हैं, 

“हम ठेला पर बैसि कए/तौनी पर सूतल एक पलिया ओढ़ने/भारत-भाग्य-विधाताक/चारूकात परिक्रमा कए रहल छी”

(मैं ठेला पर बैठ कर/गमछा पर सोये और ओढ़े/भारत-भाग्य-विधाता की/चारों दिशा में कर रहे हैं परिक्रमा)

मिथिला लोक गांधी के अहिंसा के सिद्धांत को मानता है. उसे विश्वास है कि भारत अहिंसा का देश है. मिथिला लोक साहित्य में

स्वदेशी आंदोलन, चरखा, सत्य, अहिंसा, नमक का बहिष्कार, महात्मा गांधी, राष्ट्र प्रेम आदि की रचना बहुतायत से मिलती है.

राजकमल चौधरी, कीर्तिनारायण मिश्र, सुकान्त सोम, भीमनाथ झा, धूमकेतु, यात्री जी, आदि ने भारत बोध पर आधारित तमाम

रचनाएँ की हैं. 

मिथिला लोक साहित्य में राजनीतिक विद्रूपता की बार अहम् तरीके से उठाई गई है, जो किसी और साहित्य में विरले देखने को

मिलता है. जीवकांत जी लिखते हैं, 

“चकर-चकर चकुआइत देखै छी/ भोट काल मतदाता/ लबर-लबर मिसरीकें बाँटथि/ भारत-भाग्य-विधाता/ सिहरि-सिहरि देखथि

गछ-कट्टी/ बौकी धरती माता।”

(आश्चर्य चकित होकर देखते हैं/ वोट देते समय मतदाता/ खूब मीठे-मीठे भाषण बांटे हैं/ भारत-भाग्य-विधाता /सिहरते हुए पेड़

काटते देखती हैं/ गम रहने वाली धरती माता।)

कवि सिर्फ भारतीय राजनीति पर कटाक्ष ही नहीं करता बल्कि पर्यावरण को लेकर भी चिंतित है. यही तो भारतबोध है, जो

समाज में घटित घटनाओं के साथ-साथ समाज के अस्तित्व और प्रकृति को लेकर भी लोक को जागरूक करता है. वे राजनीति

की ओट में अपनी रोटी सेंकने वालों को राजनीति पांडा कहलाने में नहीं हिचकिचाते और एक-साथ वे नेताओं और पंडों पर भी

शब्दों का प्रहार करते हैं. मिथिला लोक साहित्य लोक को जगाने वाला साहित्य है. 

मिथिला लोक साहित्य का मूल स्वभाव है भारत बोध. लोक से जुड़कर और उनके स्थिति पर प्रश्न करना लोक साहित्य में मूल

में है. लोक के विचार को प्रश्रय देने का स्वाभाव लोक साहित्य में है. यहाँ की कविता में प्रेम और करुणा है जो लोक का अहम्

तत्व है. भारत बोध जमीन पर जमे रहने की सीख भी देता है. भारत बोध कहता है कि आप अपने जीवन में कितने में क्यों न

ऊंचाई पा लें लेकिन अपनी जमीन को न भूलें। अपने गांव के संस्कार को न भूलें। तभी तो युवा कवियित्री मुन्नी कामत लिखती

हैं, “उडू आकासपर/ मुदा पैर राखब/ जमीनपर नहि बिसरी/ शहर बसाउ कतेको मुदा/अपन गामक संस्कार नहि बिसरी”

(उड़ें आकाश पर/ लेकिन पैर रखना/ जमीन पर न भूलें/ शहर जाएँ कितना भी/ अपने गांव के संस्कार न भूलें)

मिथिला लोक साहित्य में राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और साहित्यिक पर विचार विमर्श किया गया है, जो भारत बोध में

अन्तर्निहित है. यहाँ का साहित्य लोक को ध्यान में रखते हुए प्रगतिशील मूल्य में आस्था रखता है. अखिल मानवता की भावना

से ओत-प्रोत है. यहाँ के साहित्य में सौंदर्य के क्षेत्र का विस्तार दीखता है. यहाँ कटु यथार्थ की अभिव्यक्ति लक्षित होती है. लोक

को ध्यान में रखते हुए संत्रास, कुंठा, धर्म एम् अविश्वास, अनास्था, जीजिविषा आदि साहित्य में नजर में आता है. 

पंचानन मिश्र अपनी पुस्तक ‘लोक-विमर्श’ में मिथिला लोक के सामुदायिक सह-अस्तित्व की चर्चा विस्तार से की है. वे लिखते हैं

कि मिथिला में लोक-विमर्श, लोक वार्ता, लोक सम्भाषण, लोक-संपर्क, लोक-नीति आदि लोक जीवन में, दैनिक जीवन में,

सामुदायिक जीवन में इस कदर घुला-मिला है कि सामाजिक प्राणी की अवधारणा चरितार्थ होता है. लोक समाज के विविध

आयाम, मानवीय संवेदना, नैसर्गिक कलात्मक अभिव्यक्ति, परंपरागत तथ्य आदि मैथिली लोक साहित्य में बखूबी दृष्टिपात

होते हैं. यहाँ लोक बोध की स्थिति यह है कि लोकगीत, लोकोक्ति, रीति-रिवाज, प्रकृति, जनश्रुति, संबंध, लोकगाथा, नारी-पुरुष

प्रस्थिति, विश्वास, टोनावाद, लोक नृत्य, लोक नाट्य, आंगिक अभिव्यक्ति आदि का समवेश बहुतायत से देखने को मिलता है.

मिथिला लोक में लोक विमर्श की स्थिति यह है कि सामान्य तौर पर ‘लोक क्या कहेंगे’, ‘लोक के कहने से क्या’, ‘लोक जो कहें’,

‘कहा जो’, ‘आप सभी के कहने से क्या होगा’, ‘लोक कहेंगे, लोक सुनेंगे’ आदि का प्रयोग आदि काल से करते रहे हैं. 

मिथिला में लोक समाज में इतना गहरे तौर पर विद्यमान है कि लोक विमर्श की परंपरा आम के बगीचे की रखवाली करते समय,

सामूहिक रूप से आग तपते समय, रोपी गई फसल से घास हटते समय, तम्बाकू सुखाते समय, चावल के मिल पर बैठे हुए,

धान को साफ़ करते समय, ईंट बनाते समय, जंगल से लकड़ी चुनते हुए, रोपनी करते समय आदि सामूहिक कार्य के संपादन

करते समय लोक-विमर्श की परंपरा है. इतना ही नहीं, प्राकृतिक आपदा के समय, आकस्मिक घटना के समय, पारिवारिक

समस्या सहित राष्ट्र की समस्या के वक्त भी लोक-विमर्श सहज ही होता है. लोक विमर्श सामाजिक प्रक्रिया के संदर्भ में देखा

जाता है जो भारत बोध के अहम् हिस्सा है.     

मैथिली लोक साहित्य में निरंकुश शासन-व्यवस्था के स्थान पर जनकल्याणकारी शासन व्यवस्था की स्थापना पर जोर दिया गया है.

यहाँ भारत बोध का आधिक्य इस तरह है कि लोक साहित्य में राजा, राजतन्त्र, कलक्टर, चपरासी, अमीन, सिपाही, चौकीदार,

राजस्व कर्मचारी, साहूकार, गोदाम, उद्यान, गुप्तचर, व्यापर, पेशेवर, शोषण, पहलवान, नारी सत्ता आदि का चित्रण व्यापक

तौर पर है. गौरतलब है कि शासन प्रबंध में गोपनीयता, गुप्तचर आदि की अहम् भूमिका का वर्णन कौटिल्य ने अर्थशास्त्र में

किया है, वहीं सलहेश लोक गाथा में चौहड़मल को पकड़ने के लिए सबसे पहले कुसुमा और नट्टिन हंसपतिया उसे शराब

पिलाते हैं. बाद में सलहेश और दौना मालिनी वेश बदल कर छद्म वेश में नट और नटिनी बन कर राजमहल में प्रवेश करते हैं. 

‘जट-जाटिन’ लोक नाट्य में प्रशासन के अनाचार को प्रतिपद करने की प्रवृति दिखाई देती है. मैथिली लोक साहित्य में

संघर्षशील नारी और नारी सशक्तिकरण का चित्रण है. नारी के युद्ध-कौशल, प्रशासनिक, वाणिज्यिक, बुद्धिमान होने के कई

दृष्टान्त लोक साहित्य में हैं. ‘नैका-बनिजारा’ में नारी पात्र विश्व व्यापर पर अकेले दिखाई देती है. कोल्हाम कोड़ा की रानी

प्रशासन के कार्य में दक्ष है. यहाँ के साहित्य में भारत बोध इस कदर आत्मसात किया हुआ है कि सोनार, नाई, लोहार,

पहलवान, नर्त्तक आदि पेशेवर लोगों को राज्य संरक्षण देता है. ‘गांगो’ कथा में सोनार को लेकर कहा गया, ‘कहाँ जेल किए भेल

सोनरबा भैया रे/गढ़िये दियौ ने बीछिया’. मतलब सोनार भैया कहाँ गए, एक बिछिया बना दीजिये। लोक साहित्य में लोक के

सभी वर्णों को सामान स्थान प्राप्त है. 

मिथिला लोक में नृत्य भी भारत बोध को दर्शाता है. यहाँ के लोक जीवन में नारदीय, मसान भैख, झिझिया, नैना-योगिन, दुलाराम

, मूलाधारचक्र नृत्य, लोरिक, चौपहरा, विषहरा नृत्य, कोहबर, कमला नृत्य, विजयमल्ल नृत्य, सामा-चकेबा, करमा नृत्य,

जादुर-नाच, शशिया, डोमकच्छ, जट-जटिन, झूमर, धानरोपनी, धनकट्टी, पुतोहिया नाच, नट-नट्टिन, विदापत नाच, मृदंग नाच

आदि प्रमुख हैं और लोक साहित्य में प्रचुर मात्रा में रचना मौजूद है. 

मिथिला लोक साहित्य का दायरा व्यापक है. यहाँ भारत बोध का दायरा भी व्यापक है. यहाँ का साहित्य संस्कार की बात करता

है, परम्परा की बात करता है, स्त्री पात्र की बात करता है. प्राकृतिक आपदा की बात करता है. लोक और भारत की प्रगति की

बात करता है. लोकगाथा की बात करता है. बौद्धिक और सांस्कृतिक विकास की बात करता है. मानवीय जैविकता और

जातीय जीवन की बात करता है. लोक में जन-जागरण की बात करता है. युवा शक्ति की ताकत की बात करता है.

आत्म-ज्योति की बात करता है. यहाँ का साहित्य मन की बात करता है. सत्य और स्वप्न की बात करता है. नवजीवन की बात

करता है. निर्मल प्रेम की बात करता है. जिज्ञासा की बात करता है. युग बोध की बात करता है. भारत बोध की बात करता है. 

विनीत उत्पल (2022), मैथिली लोक साहित्य में भारत बोध, प्रो. बृज किशोर कुठियाला, प्रो.संजीव कुमार शर्मा एवं प्रो.श्रीप्रकाश सिंह (संपादक), लोक परंपराओं में स्व का बोध, पृष्ठ 280-289, किताबवाले, दिल्ली, ISSN 978-93-90702-76-3

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