8/15/2020

एस.पी.सिंह से राजीव त्यागी तक: दिमाग से दिल तक

विनीत उत्पल

कांग्रेस के तेजतर्रार प्रवक्ता राजीव त्यागी की 12 अगस्त, 2020 को हुई मौत के बाद टीवी डिबेट के स्वरूप को लेकर एक बहस शुरू हो गई है (https://www.youtube.com/watch?v=6rsPrSa_ftE). लोग टीवी डिबेट कार्यक्रम के विषय, भाषा, एंकर आदि की भूमिका सहित तमाम विषयों पर बात करने लगे हैं और प्रश्नचिन्ह उठाने लगे हैं. नई पीढी को शायद ही पता हो कि भारत में टीवी समाचार चैनल की बुनियाद ही व्यक्ति यानी एक पत्रकार की मौत पर ही पड़ी है. 

आज से ठीक 23 वर्ष पहले जब समाचार चैनल का बीजारोपण किया गया था, तब समाचार पढने के बाद ही एंकर यानी सुरेन्द्र प्रताप सिंह यानी एस.पी. सिंह का ब्रेन हेमरेज हुआ था और कुल 13 दिन जीवन और मौत से संघर्ष करने के बाद 27 जून, 1997 को उनकी मौत हो गई थी. मतलब यह कि राजीव त्यागी की मौत दिल के काम बंद करने के कारण हुई और एस.पी.सिंह की मौत दिमाग पर झटके लगने के कारण हुई. इसका सीधा अर्थ है कि दिमाग और दिल को साथ लेकर यदि सूचना की दुनिया में शामिल हुआ जाय तो वह जानलेवा भी साबित हो सकता है. यदि यह स्थिति पत्रकारों और विषय विशेषज्ञों की है तो समाचार देखने वाले दर्शकों पर क्या बीतती होगी, इसका आंकलन किया जा सकता है. ख़बरों की दुनिया सिर्फ सूचनाएं ही नहीं देती, मौत का तांडव भी मचाती है. यह दृश्य-श्रव्य माध्यम किस तरह जानलेवा साबित हो रहा है इसकी बानगी यह है कि जनसत्ता के संस्थापक संपादक प्रभाष जोशी की मौत भी टीवी पर क्रिकेट मैच देखने के बाद हुई थी, जिसमें सचिन तेंदुलकर के बेहतरीन खेल के बाद भी भारत वह मैच हार गया था.

राजीव त्यागी अपने मौत के दिन ‘आज तक’ समाचार चैनल पर शाम पांच बजे के कार्यक्रम ‘दंगल’ में टीवी डिबेट में भाजपा के संबित पात्रा सहित अन्य लोगों के साथ बतौर पैनालिस्ट शामिल थे. कहा जा रहा है कि डिबेट के दौरान ही उन्हें हार्ट अटैक आया और कार्यक्रम के अंतिम हिस्से के दौरान वे बेहोश हो गए और आनन-फानन में उन्हें अस्पताल ले जाया गया, जहाँ चिकित्सकों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया. इसी ‘आज तक’ ने मेट्रो चैनल पर आज से 23 वर्ष पहले रात दस बजे अपने एक घंटे के कार्यक्रम को राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के ग्रीन पार्क स्थित ‘उपहार’ सिनेमा हाल और ‘बॉर्डर’ फिल्म पर केन्द्रित की थी. इससे एक दिन पहले शुक्रवार को ‘उपहार’ सिनेमा हाल में आग लग गई थी जिसमे 59 लोग मरे गए थे. एक सौ से अधिक लोग घायल हो गए थे. इसके एक दिन बाद शनिवार था. एस.पी. सिंह रात दस बजे समाचार प्रस्तोता थे और इस समाचार के आखिर में उन्होंने कहा था, ‘जिन्दगी तो अपनी रफ़्तार से चलती रहती है.’ कहा जाता है कि इस खबर को प्रस्तुत करते समय ही एस.पी.सिंह को ब्रेन स्टोक हुआ था. उनकी जिन्दगी तो चली गई लेकिन समाचार चैनलों की जिन्दगी तेज रफ़्तार से चलती रही. 

कभी सिर्फ एक घंटे के समाचार कार्यक्रम के शुरुआत करने वाले ‘आजतक’ एक उदाहरण है कि कैसे समाचार चैनल पूरे चौबीस घंटे चल सकता है और कालांतर में तमाम चैनल सामने आये और उनका बिजनेस मॉडल सफल रहा. आज स्थिति यह है कि शैक्षिक चैनल के तौर पर भारत में जिस दृश्य-श्रव्य माध्यम की शुरुआत हुई थी, वह सामाजिक, राजनीतिक सरोकारों के समाचारों से इतर भूत-प्रेत के रास्ते अपने मूल रूप यानी ‘हॉट मीडिया’ में तब्दील हो चुका है. संचारविदों ने जहाँ प्रिंट मीडिया को ‘कोल्ड मीडिया’ बताया है, वहीं टीवी को ‘हॉट मीडिया’ करार दिया है. इसका अर्थ यह है कि समाचार पत्र और पत्रिकाओं को पढ़कर पाठकों के मन में उन्माद पैदा नहीं होता लेकिन टीवी जैसे माध्यम से दर्शकों के मन में गुस्सा, उन्माद आदि पैदा होते हैं. ‘हॉट मीडियम’ सिर्फ दर्शकों को ही नहीं बल्कि एंकरों, विषय-विशेषज्ञों सहित राजनीतिक पार्टी के प्रवक्ताओं के रगों में एक आक्रोश पैदा करते हैं. सूचना की दुनिया अन्य लोगों के साथ-साथ समाचार से जुड़े तमाम लोगों के मन-मस्तिष्क पर बहुत बुरा प्रभाव डालता है. 

सन 1993 में सूडान में अकाल आया था. दक्षिण अफ्रीका के फोटो पत्रकार केविन कार्टर अकाल से पीड़ित इलाकों का दौरा किया था. 26 मार्च, 1993 को न्यूयार्क टाइम्स में उनके द्वारा खींची गई एक फोटो प्रकाशित हुई थी, जिसमें भूख से पीड़ित एक छोटी-सी बच्ची को पीछे से एक गिद्ध खाने के लिए लालायित है. इस तस्वीर के बाद पूरी दुनिया में तहलका मच गया. इसके लिए केविन कार्टर को फोटोग्राफी के लिए पुलित्जर पुरस्कार भी मिला. मगर इस फोटोग्राफर ने मानसिक परेशानी के कारण महज 33 वर्ष की आयु में खुदखुशी कर ली. कोरोना काल में दैनिक भास्कर के रिपोर्टर तरुण सिसोदिया ने कोरोना पीड़ित होने के बाद एम्स के चौथे मंजिल से कूद कर आत्महत्या कर ली. प्रेस ट्रस्ट ऑफ़ इण्डिया (पीटीआई) के रांची ब्यूरो चीफ पी.वी. रामानुजन ने पंखे से लटककर अपनी जान दे दी. वाराणसी में रिपब्लिक भारत के पत्रकार रोहित श्रीवास्तव ने पुल से कूदकर खुदकुशी की.

ऐसे हादसों का सीधा अर्थ है कि सूचनाओं का बाजार दिल से लेकर दिमाग पर भारी असर कर रहा है. समाचारों की दुनिया में रहने वाला पत्रकार ही न सिर्फ मानसिक तनाव से जूझता है बल्कि इस दुनिया से जुड़े तमाम लोग यानी फोटोग्राफर, एंकर, प्रोड्यूसर, प्रवक्ता आदि को भी सूचनाओं की दुनिया में मानसिक आघात लगता है. हालाँकि राजीव त्यागी की मौत के बाद ‘दंगल’ कार्यक्रम के एंकर रोहित सरदाना सहित ‘आजतक’ चैनल को भी निशाना बनाया जा रहा है. यह कदम असल विषय से लोगों की नजर हटाने और उसकी गंभीरता को कम करने का है. असल मुद्दा टीवी डिबेट के स्वरूप का है. यह सच है कि टीआरपी की होड़ में अपने कार्यक्रम को लेकर तमाम चैनलों के एंकर डिबेट में शामिल लोगों को उकसाते हैं और एक हंगामा खड़ा करने की कोशिश करते हैं. साथ ही, विषय के चुनाव, उसकी हेडिंग को ऐसे प्रस्तुत करते हैं, जिससे दर्शकों के बीच उत्तेजना फैले. ऐसी स्थिति में दो बातें हो सकती हैं. पहला यह कि या तो एंकर टीआरपी से ध्यान हटाकर खुद पर नियंत्रण रहे और ऐसी विषय या भाषा का चुनाव न करे, जिससे उत्तेजना फैले. दूसरा यह कि पैनल में बैठे लोग खुद के साथ एंकर की भाषा पर लगाम लगाए, जैसा एक शो में राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के प्रवक्ता और दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर मनोज झा ने अर्नब गोस्वामी को लाइव डिबेट में समझाया था कि वे एक प्रोफ़ेसर पहले हैं, इसलिए उनसे शालीनता से बात करें. भारत के पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने भी राजदीप सरदेसाई को एक शो के दौरान कहा था कि पूर्व राष्ट्रपति से कैसे शालीनता से बात की जाती है, इसे जानें.

वक्त है शांत-चित्त होकर विचार-विमर्श करने का. समाचार चैनलों और मीडिया अध्यापन से जुड़े लोगों को सोचने का. राजीव त्यागी की मौत एक उदाहरण हो सकता है कि किसी भी बहस का स्तर कैसा हो, भाषा कैसी हो या फिर कैसे इसे नए स्वरूप में लाया जाय. समाचार से जुड़े तमाम प्लेटफोर्म का काम है सूचनाएं देना, न कि सनसनी फैलाना. यदि टीआरपी की होड़ में तमाम समाचार चैनल सनसनी या उत्तेजना फैला रहे हैं, समाचारों को कॉकटेल की तरह परोस रहे हैं, शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं, तो इसका असर तो दिखेगा ही. भले ही आज राजीव त्यागी की मौत को लेकर एक हंगामा शुरू हुआ हो लेकिन यह बात सोचना होगा कि समाचार चैनल की बहस यदि उनके मौत का मुख्य कारण है, यदि उन्हें दिल का दौड़ा पड़ सकता है, तो समाचार चैनल देखने वाले दर्शकों के मन-मस्तिष्क पर क्या प्रभाव पड़ता होगा, अहम सवाल है. 

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