8/20/2020

संदेह के घेरे में ‘वाल स्ट्रीट जर्नल’ और भारतीय मीडिया का ‘अंडरवर्ल्ड’

विनीत उत्पल

जिस ‘वाल स्ट्रीट जर्नल’ में फेसबुक और सत्ताधारी दल को लेकर छपी रिपोर्ट पर भारतीय मीडिया का ‘अंडरवर्ल्ड’ गैंग बौद्धिक जुगाली कर रहा है, वही ‘वाल स्ट्रीट जर्नल’ अपनी विश्वसनीयता के संदेह के घेरे में है. इसकी विश्वसनीयता पर प्रश्नचिन्ह और कोई नहीं बल्कि उनके यहाँ काम कर रहे कुल 280 रिपोर्टरों, संपादकों और विभिन्न कर्मचारियों ने लगाया है. 

21 जुलाई, 2020 को ‘वाल स्ट्रीट जर्नल’ ने छपी खबर के मुताबिक, सभी कर्मचारियों ने मिलकर डॉव जोन्स कंपनी के सीईओ आल्मर लाटुर को एक पात्र सौंपा इस पत्र में इस बात की शिकायत दर्ज कराई गई कि जर्नल के ‘ओपिनियन’ सेक्शन में गलत जानकारी (missinformation) दी जा रही है (https://www.wsj.com/articles/wsj-journalists-ask-publisher-for-clearer-distinction-between-news-and-opinion-content-11595349198). मगर, भारतीय मीडिया का ‘अंडरवर्ल्ड’ जर्नल मे ‘ओपिनियन सेक्शन’ में प्रकाशित सामग्री को सत्य मानकर अपने तमाम प्लेटफ़ॉर्म पर बौद्धिक जुगाली कर रहा है और फेसबुक के साथ-साथ केंद्र की सत्ताधारी दल को निशाना बना रहा है. गौरतलब है कि भारतीय मीडिया का ‘अंडरवर्ल्ड’ जिस विचार पर इतना गरमागरम बहस कर रहा है, उसे न्यूले पुर्नेल और जेफ्फ होर्वित्ज़ ने लिखा है और उसका शीर्षक है, ‘फेसबुक हेट स्पीच कोलाइड विद इंडियन पॉलिटिक्स’ (https://www.wsj.com/articles/facebook-hate-speech-india-politics-muslim-hindu-modi-zuckerberg-11597423346).

‘वाल स्ट्रीट जर्नल’ में काम कर रहे समूह ने अपने पत्र में आरोप लगाया था कि जर्नल के समाचार पक्ष और विचार पक्ष भिन्न-भिन्न हैं और विचार पक्ष की विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्नचिन्ह खड़ा हो रहा है. जर्नल में प्रकाशित होने वाले विचारों में प्रकाशन से पहले न तो तथ्यों की जाँच की जाती है और न ही पारदर्शिता हे बरती जा रही है. यहाँ सबूतों की कोई इज्जत नहीं होती है. कई पाठक रिपोर्टिंग और ओपिनियन में अंतर नहीं कर पा रहे हैं और जो लोग इस अंतर को पहचानते हैं, वे जर्नल की विश्वनीयता और निरपेक्षता को लेकर रिपोर्टर से जवाब-तलब करते हैं, जिसका उत्तर रिपोर्टर के पास नहीं होता (https://www.dailymail.co.uk/news/article-8550107/280-Wall-Street-Journal-writers-sign-letter-protesting-misinformation-papers-opinion-pieces.html). उन्होंने अपने पत्र में जर्नल में प्रकाशित कई विचारों की जानकारी दी जिसमें गलत तथ्य पाठकों के सामने परोसे गए थे. इनमें कंपनी के उपाध्यक्ष माइक पेन्स का लिखा हुआ आलेख हो (https://www.wsj.com/articles/there-isnt-a-coronavirus-second-wave-11592327890) या फिर मैक डोनाल्ड का लिखा कॉलम (https://www.wsj.com/articles/the-myth-of-systemic-police-racism-11591119883). इन आलेखों में तमाम गलत तथ्य रखे गए हैं. जाहिर-सी बात है कि ‘वाल स्ट्रीट जर्नल’ को लेकर किसी सरकार या किसी संगठन का यह आरोप होता तो एक बार विचार किया जा सकता था कि वह सही भी हो सकता है और गलत भी. यहाँ आरोप वहां कार्य कर रहे पत्रकारों और संपादकों के द्वारा लगाया हुआ है. भले ही लोग इस बात पर विश्वास न करें या मजाक में लें, लेकिन यह सत्य है कि दुनिया के सबसे ताकतवर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने भी ‘वाल स्ट्रीट जर्नल’ ने भी ‘वाल स्ट्रीट जर्नल’ पर फेक न्यूज़ फैलने का आरोप लगा चुके हैं (https://thehill.com/homenews/administration/492084-trump-slams-wsj-for-failing-to-mention-ratings-in-critical-editorial).


यह बात किसी से छुपी हुई नहीं है कि भारत सहित दुनिया के तमाम देशों के सत्ताधारी दल हमेशा से मीडिया को अपने पक्ष में खबर प्रकाशित करने के तमाम पैंतरे चलते रहते हैं, जिससे अपने पक्ष में जनता को किया जा सके. ऐसे में ‘वाल स्ट्रीट जर्नल’ में प्रकाशित विचार में नया क्या है. इससे पहले भी ब्लूमबर्ग ने भी फेसबुक और राजनीतिक प्रोपोगंडा को लेकर खबर प्रकाशित की थी. ऐसे में इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि वैश्विक मीडिया भारत और भारत सरकार को लेकर नकारात्मक ख़बरें प्रकाशित और प्रसारित करती रही हैं और भारतीय मीडिया का ‘अंडरवर्ल्ड’ उसे पाने पक्ष में भुनाते रहता है. जहाँ की सरकार मजबूत होती है, जनता का सपोर्ट होता है, वहां सोशल मीडिया का स्थान दोयम दर्जा का होता है. जहाँ की सरकार कमजोर होती है, वहां सोशल मीडिया सरकार के खिलाफ जनता को भड़काने का कार्य करती है और सफल भी होती है, जैसा ‘अरब स्प्रिंग’ मामले में हुआ. जो लोग सोशल मीडिया को बतौर ‘मनोरंजन’ का एक प्लेटफार्म मानते हैं, उन्हें यह हवाबाजी करने में अच्छा लगता है और हतप्रभ हैं कि फेसबुक ने किसी खास दल के पक्ष में कार्य कैसे किया. जो लोग फेसबुक के कंटेंट को लेकर अध्ययन कर रहे हैं, उन्हें बखूबी पता है कि सोशल मीडिया का यह प्लेटफ़ॉर्म किस तरह से ‘हेट-स्पीच’ को बरकरार रखता है और इस पर कोई अंकुश नहीं लगाता (https://www.hbs.edu/faculty/Pages/item.aspx?num=52409). सिर्फ फेसबुक ही क्यों ट्विटर भी ‘हेट-स्पीच’ फैलाता है. यह कार्य आज से नहीं बल्कि एक दशक से अधिक समय से हो रहा है और संचार से जुड़े शोधार्थी इस पर लगातार शोध भी कर रहे हैं (https://journals.sagepub.com/doi/abs/10.1177/0196859912458700). यह कार्य दूसरे देश के लोग नहीं बल्कि भारत के शोधार्थी भी कर रहे हैं.

‘वाल स्ट्रीट जर्नल’ का अपना एक इतिहास रहा है और इसकी रिपोर्ट ने कई अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार जीते हैं लेकिन आज जिस तरह से इसका ‘ओपिनियन’ संदेह के घेरे में है. हालत तो यह है कि जिस तरह के दुनिया भर के अधिकतर पत्रकार फील्ड रिपोर्टिंग को छोड़ विचार पक्ष के आधार पर ख़बरें तैयार कर रहे हैं, यह पत्रकारिता के लिए चुनौती है. सोशल मीडिया सामाजिक मान्यताओं को ध्वस्त कर लोगों, परिवारों, समाजों की नई छवि का निर्माण कर रहा है, इस पर एक बार सोचना होगा. मीडिया के तमाम प्लेटफ़ॉर्म पर प्रकाशित होने वाले किसी भी आलेख की विश्वसनीयता को लेकर भी सोचना होगा. भारत और भारतीय मीडिया के ‘’अंडरवर्ल्ड’ की स्थिति अलग है और वह किसी भी झूठे समाचार में घंटों ही नहीं कई दिनों तक बहस कर सकता है या फिर कई सही घटना को अनदेखी भी कर सकता है. जो जर्नल खुद अपने कर्मचारियों के द्वारा संदेह के घेरे में हो, ऐसे में उस जर्नल में प्रकाशित किसी ‘ओपिनियन’ को लेकर जिस तरह से भारतीय मीडिया का ‘अंडरवर्ल्ड’ गंभीरता से लेता दिखाई दी रहा है, वह चिंता का विषय है. भारतीय लोकतंत्र में मीडिया को इतनी स्वतंत्रता मिलने के बाद भी भारतीय मीडिया का ‘अंडरवर्ल्ड’ वैसी खबर नहीं निकाल पा रहा है, जो सरकार को अच्छी तरह से कठघरे में खड़ा कर सके. अपनी असफलता को छुपाने के लिए वह किस तरह पश्चिमी मीडिया में लिखे ओपिनियन को बहस का एक आधार बना रहा है. भारतीय मीडिया की नाकामी हर मोर्चे पर लगातार दिख रही है और किस तरह पश्चिमी देशों या पश्चिमी मीडिया के इशारे पर यहाँ का ‘अंडरवर्ल्ड’ कार्य कर रहा है, यह भी चिंता का विषय है.

बहरहाल, सरकार से अधिक विश्वसनीयता का संकट मीडिया पर मंडरा रहा है. प्रिंट मीडिया से लेकर टीवी मीडिया तक या फिर सोशल मीडिया की विश्वसनीयता को लेकर हर दिन प्रश्नचिन्ह लग रहे हैं. फेक न्यूज़ के दौर में जिस तरह से ग्राउंड रिपोर्टिंग में कमी आई है, खबर संकलन के मामले में रिपोर्टर की निर्भरता सोशल मीडिया पर बड़ी है, समाचार से अधिक विचार पक्ष को प्रमुखता दी जा रही है, ऐसे में यह विचार करना आवश्यक है कि यदि ऐसी स्थिति रही तो सूचना की दुनिया कहाँ होगी और इसकी विश्वसनीयता कहाँ होगी और लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की आगामी रुपरेखा कहाँ होगी, सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है.   


8/15/2020

एस.पी.सिंह से राजीव त्यागी तक: दिमाग से दिल तक

विनीत उत्पल

कांग्रेस के तेजतर्रार प्रवक्ता राजीव त्यागी की 12 अगस्त, 2020 को हुई मौत के बाद टीवी डिबेट के स्वरूप को लेकर एक बहस शुरू हो गई है (https://www.youtube.com/watch?v=6rsPrSa_ftE). लोग टीवी डिबेट कार्यक्रम के विषय, भाषा, एंकर आदि की भूमिका सहित तमाम विषयों पर बात करने लगे हैं और प्रश्नचिन्ह उठाने लगे हैं. नई पीढी को शायद ही पता हो कि भारत में टीवी समाचार चैनल की बुनियाद ही व्यक्ति यानी एक पत्रकार की मौत पर ही पड़ी है. 

आज से ठीक 23 वर्ष पहले जब समाचार चैनल का बीजारोपण किया गया था, तब समाचार पढने के बाद ही एंकर यानी सुरेन्द्र प्रताप सिंह यानी एस.पी. सिंह का ब्रेन हेमरेज हुआ था और कुल 13 दिन जीवन और मौत से संघर्ष करने के बाद 27 जून, 1997 को उनकी मौत हो गई थी. मतलब यह कि राजीव त्यागी की मौत दिल के काम बंद करने के कारण हुई और एस.पी.सिंह की मौत दिमाग पर झटके लगने के कारण हुई. इसका सीधा अर्थ है कि दिमाग और दिल को साथ लेकर यदि सूचना की दुनिया में शामिल हुआ जाय तो वह जानलेवा भी साबित हो सकता है. यदि यह स्थिति पत्रकारों और विषय विशेषज्ञों की है तो समाचार देखने वाले दर्शकों पर क्या बीतती होगी, इसका आंकलन किया जा सकता है. ख़बरों की दुनिया सिर्फ सूचनाएं ही नहीं देती, मौत का तांडव भी मचाती है. यह दृश्य-श्रव्य माध्यम किस तरह जानलेवा साबित हो रहा है इसकी बानगी यह है कि जनसत्ता के संस्थापक संपादक प्रभाष जोशी की मौत भी टीवी पर क्रिकेट मैच देखने के बाद हुई थी, जिसमें सचिन तेंदुलकर के बेहतरीन खेल के बाद भी भारत वह मैच हार गया था.

राजीव त्यागी अपने मौत के दिन ‘आज तक’ समाचार चैनल पर शाम पांच बजे के कार्यक्रम ‘दंगल’ में टीवी डिबेट में भाजपा के संबित पात्रा सहित अन्य लोगों के साथ बतौर पैनालिस्ट शामिल थे. कहा जा रहा है कि डिबेट के दौरान ही उन्हें हार्ट अटैक आया और कार्यक्रम के अंतिम हिस्से के दौरान वे बेहोश हो गए और आनन-फानन में उन्हें अस्पताल ले जाया गया, जहाँ चिकित्सकों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया. इसी ‘आज तक’ ने मेट्रो चैनल पर आज से 23 वर्ष पहले रात दस बजे अपने एक घंटे के कार्यक्रम को राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के ग्रीन पार्क स्थित ‘उपहार’ सिनेमा हाल और ‘बॉर्डर’ फिल्म पर केन्द्रित की थी. इससे एक दिन पहले शुक्रवार को ‘उपहार’ सिनेमा हाल में आग लग गई थी जिसमे 59 लोग मरे गए थे. एक सौ से अधिक लोग घायल हो गए थे. इसके एक दिन बाद शनिवार था. एस.पी. सिंह रात दस बजे समाचार प्रस्तोता थे और इस समाचार के आखिर में उन्होंने कहा था, ‘जिन्दगी तो अपनी रफ़्तार से चलती रहती है.’ कहा जाता है कि इस खबर को प्रस्तुत करते समय ही एस.पी.सिंह को ब्रेन स्टोक हुआ था. उनकी जिन्दगी तो चली गई लेकिन समाचार चैनलों की जिन्दगी तेज रफ़्तार से चलती रही. 

कभी सिर्फ एक घंटे के समाचार कार्यक्रम के शुरुआत करने वाले ‘आजतक’ एक उदाहरण है कि कैसे समाचार चैनल पूरे चौबीस घंटे चल सकता है और कालांतर में तमाम चैनल सामने आये और उनका बिजनेस मॉडल सफल रहा. आज स्थिति यह है कि शैक्षिक चैनल के तौर पर भारत में जिस दृश्य-श्रव्य माध्यम की शुरुआत हुई थी, वह सामाजिक, राजनीतिक सरोकारों के समाचारों से इतर भूत-प्रेत के रास्ते अपने मूल रूप यानी ‘हॉट मीडिया’ में तब्दील हो चुका है. संचारविदों ने जहाँ प्रिंट मीडिया को ‘कोल्ड मीडिया’ बताया है, वहीं टीवी को ‘हॉट मीडिया’ करार दिया है. इसका अर्थ यह है कि समाचार पत्र और पत्रिकाओं को पढ़कर पाठकों के मन में उन्माद पैदा नहीं होता लेकिन टीवी जैसे माध्यम से दर्शकों के मन में गुस्सा, उन्माद आदि पैदा होते हैं. ‘हॉट मीडियम’ सिर्फ दर्शकों को ही नहीं बल्कि एंकरों, विषय-विशेषज्ञों सहित राजनीतिक पार्टी के प्रवक्ताओं के रगों में एक आक्रोश पैदा करते हैं. सूचना की दुनिया अन्य लोगों के साथ-साथ समाचार से जुड़े तमाम लोगों के मन-मस्तिष्क पर बहुत बुरा प्रभाव डालता है. 

सन 1993 में सूडान में अकाल आया था. दक्षिण अफ्रीका के फोटो पत्रकार केविन कार्टर अकाल से पीड़ित इलाकों का दौरा किया था. 26 मार्च, 1993 को न्यूयार्क टाइम्स में उनके द्वारा खींची गई एक फोटो प्रकाशित हुई थी, जिसमें भूख से पीड़ित एक छोटी-सी बच्ची को पीछे से एक गिद्ध खाने के लिए लालायित है. इस तस्वीर के बाद पूरी दुनिया में तहलका मच गया. इसके लिए केविन कार्टर को फोटोग्राफी के लिए पुलित्जर पुरस्कार भी मिला. मगर इस फोटोग्राफर ने मानसिक परेशानी के कारण महज 33 वर्ष की आयु में खुदखुशी कर ली. कोरोना काल में दैनिक भास्कर के रिपोर्टर तरुण सिसोदिया ने कोरोना पीड़ित होने के बाद एम्स के चौथे मंजिल से कूद कर आत्महत्या कर ली. प्रेस ट्रस्ट ऑफ़ इण्डिया (पीटीआई) के रांची ब्यूरो चीफ पी.वी. रामानुजन ने पंखे से लटककर अपनी जान दे दी. वाराणसी में रिपब्लिक भारत के पत्रकार रोहित श्रीवास्तव ने पुल से कूदकर खुदकुशी की.

ऐसे हादसों का सीधा अर्थ है कि सूचनाओं का बाजार दिल से लेकर दिमाग पर भारी असर कर रहा है. समाचारों की दुनिया में रहने वाला पत्रकार ही न सिर्फ मानसिक तनाव से जूझता है बल्कि इस दुनिया से जुड़े तमाम लोग यानी फोटोग्राफर, एंकर, प्रोड्यूसर, प्रवक्ता आदि को भी सूचनाओं की दुनिया में मानसिक आघात लगता है. हालाँकि राजीव त्यागी की मौत के बाद ‘दंगल’ कार्यक्रम के एंकर रोहित सरदाना सहित ‘आजतक’ चैनल को भी निशाना बनाया जा रहा है. यह कदम असल विषय से लोगों की नजर हटाने और उसकी गंभीरता को कम करने का है. असल मुद्दा टीवी डिबेट के स्वरूप का है. यह सच है कि टीआरपी की होड़ में अपने कार्यक्रम को लेकर तमाम चैनलों के एंकर डिबेट में शामिल लोगों को उकसाते हैं और एक हंगामा खड़ा करने की कोशिश करते हैं. साथ ही, विषय के चुनाव, उसकी हेडिंग को ऐसे प्रस्तुत करते हैं, जिससे दर्शकों के बीच उत्तेजना फैले. ऐसी स्थिति में दो बातें हो सकती हैं. पहला यह कि या तो एंकर टीआरपी से ध्यान हटाकर खुद पर नियंत्रण रहे और ऐसी विषय या भाषा का चुनाव न करे, जिससे उत्तेजना फैले. दूसरा यह कि पैनल में बैठे लोग खुद के साथ एंकर की भाषा पर लगाम लगाए, जैसा एक शो में राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के प्रवक्ता और दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर मनोज झा ने अर्नब गोस्वामी को लाइव डिबेट में समझाया था कि वे एक प्रोफ़ेसर पहले हैं, इसलिए उनसे शालीनता से बात करें. भारत के पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने भी राजदीप सरदेसाई को एक शो के दौरान कहा था कि पूर्व राष्ट्रपति से कैसे शालीनता से बात की जाती है, इसे जानें.

वक्त है शांत-चित्त होकर विचार-विमर्श करने का. समाचार चैनलों और मीडिया अध्यापन से जुड़े लोगों को सोचने का. राजीव त्यागी की मौत एक उदाहरण हो सकता है कि किसी भी बहस का स्तर कैसा हो, भाषा कैसी हो या फिर कैसे इसे नए स्वरूप में लाया जाय. समाचार से जुड़े तमाम प्लेटफोर्म का काम है सूचनाएं देना, न कि सनसनी फैलाना. यदि टीआरपी की होड़ में तमाम समाचार चैनल सनसनी या उत्तेजना फैला रहे हैं, समाचारों को कॉकटेल की तरह परोस रहे हैं, शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं, तो इसका असर तो दिखेगा ही. भले ही आज राजीव त्यागी की मौत को लेकर एक हंगामा शुरू हुआ हो लेकिन यह बात सोचना होगा कि समाचार चैनल की बहस यदि उनके मौत का मुख्य कारण है, यदि उन्हें दिल का दौड़ा पड़ सकता है, तो समाचार चैनल देखने वाले दर्शकों के मन-मस्तिष्क पर क्या प्रभाव पड़ता होगा, अहम सवाल है. 

8/02/2020

रवीश कुमार बनाम टीवी का न्यूज़रंजक चेहरा

विनीत उत्पल
मैग्ससे पुरस्कार से सम्मानित वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार टीवी समाचार जगत में न्यूज़रंजक चेहरे के तौर पर उभरे हैं. ‘न्यूज़रंजक’ शब्द ‘मनोरंजक’ शब्द से प्रेरित है यानी जहाँ ‘न्यूज़’ भी है और ‘रंजन’ भी है. वर्तमान समय में एनडीटीवी पर उनके द्वारा प्रस्तुत ‘प्राइम टाइम’ शो को देखें तो समाचार कम, मनोरंजक अधिक लगते हैं. वे कभी राष्ट्रीय मंत्रियों पर तो कभी तमाम टीवी समाचार चैनलों पर तंज कसते हैं. कभी अपने शो के पार्श्व को ‘ब्लैक’ कर खुद को पत्रकारिता का प्रतीक घोषित करते हैं. रवीश कुमार बार-बार अपने प्राइम टाइम, फेसबुक या अन्य जगहों पर दर्शकों से गुजारिश करते हैं कि वे टीवी समाचार चैनल न देखें. ऐसे में बात सामने आती हैं कि यदि दर्शक कोई समाचार चैनल न देखे तो एनडीटीवी ही क्यों देखे. यदि दर्शक एनडीटीवी भी न देखे तो इसका सीधा अर्थ है कि उनके चैनल में भी कुछ गलत परोसा जा रहा है. यदि रवीश कुमार के दावों पर विश्वास करें कि बाकी मीडिया ‘गोदी मीडिया’ है तो ऐसे में एनडीटीवी खासकर रवीश कुमार ने अपने शो का स्तर ऐसा नहीं रखा जो दर्शक कहें कि बस समाचार तो एनडीटीवी के प्राइम टाइम में ही दिखता है.
रवीश कुमार को अधिकांश दर्शक गंभीर और सामाजिक चेतना से जागृत पत्रकार के तौर पर जानते हैं. ‘रवीश की रिपोर्ट’ वाला रवीश कुमार भारतीय मीडिया जगत का वह चेहरा है, जो हर युवा के लिए ‘स्टार’ है और पत्रकारिता में आने वाला हर युवा खुद में ‘रवीश कुमार’ का अक्स देखता है. मगर, कोरोना काल या इससे कई वर्ष पहले से रवीश कुमार का पत्रकारीय चरित्र पूरी तरह बदल गया है. वे सीधे तौर पर ख़बरों को पड़ोसने या विश्लेषण करने के बजाय तमाशा प्रस्तुत करने वाले ‘मास्टर किंग’ की भूमिका में दिख रहे हैं. वे अपने शो के बेशकीमती समय में किस तरह ‘टाइम पास’ करते दीखते हैं, इसका अकादमिक अध्ययन आवश्यक है. वे अपने शो को मनोरंजक तौर पर दिखाने के लिए अधिकारियों और नेताओं को विशेष विशेषण से संबोधित तो करते हैं और ख़बरों के साथ अपने विचारों को जबरदस्ती घुसेड़ देते हैं. अपने ‘प्राइम टाइम’ शो में सरकारी विज्ञप्ति को पढ़कर लोगों का मनोरंजन भी करते हैं. ऐसे में सवाल यह है कि किसी का मजाक उड़ाने या फिर सिर्फ प्रेस विज्ञप्ति को पढ जाने से पूरी दुनिया में फैले एनडीटीवी के तमाम दर्शकों को क्या मिलता है?
29 जुलाई, 2020 के प्राइम टाइम में वे जिस तरह से ‘देखो देखो रफाल आया रफाल आया’ पेश किया और अपना चेहरा बनाया, क्या वह चेहरा मैग्ससे पुरस्कार से सम्मानित वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार का है? (https://khabar.ndtv.com/video/show/prime-time/ravish-kumars-prime-time-look-rafal-came-rafal-came-555998) 30 जुलाई, 2020 के प्राइम टाइम में वे ‘नीति कहाँ है नई शिक्षा नीति की’ में रवीश कुमार शिक्षा नीति के ड्राफ्ट नहीं मिलने की बात कहते हैं और वे पीआईबी द्वारा जारी प्रेस रिलीज़ के आधार पर खबर बनाते हैं. इसी शो में काजी नसरूल यूनिवर्सिटी के असिस्टेंट प्रोफ़ेसर देवादित्य भट्टाचार्य ‘ड्राफ्ट सर्कुलेशन’ की बात कहकर उस मसौदे पर विस्तार से चर्चा करते हैं और तमाम मीडिया संस्थान के पास ड्राफ्ट होने की बात कहते हैं. एक ही शो में ऐसा विरोधाभाष रवीश कुमार के तमाम ‘प्राइम टाइम’ शो में दिखाई देता है (https://khabar.ndtv.com/video/show/prime-time/ravish-kumars-prime-time-where-is-the-policy-of-new-education-policy-556083). इसी शो में नई शिक्षा नीति की खामियों को लेकर वे अपने विशेषज्ञ से सवाल करते हैं लेकिन क्या उनकी जिम्मेदारी नहीं बनती कि वे ड्राफ्ट की अच्छाइयों को लेकर भी दर्शकों को जानकारी दें. अध्यापन से जुड़े लोगों को पता होगा कि असिस्टेंट प्रोफ़ेसर और प्रोफ़ेसर के ज्ञान और अनुभव में कितना फासला होता है लेकिन प्राइम टाइम में नई शिक्षा नीति जैसे गंभीर और महत्वपूर्ण विषय में वे एक असिस्टेंट प्रोफ़ेसर से विचार-विमर्श करते हैं, वह भी पश्चिम बंगाल स्थित स्टेट यूनिवर्सिटी के एक शिक्षक से. क्या जेएनयू, जामिया, डीयू, कलकत्ता विश्वविद्यालय, मुंबई विश्वविद्यालय, हैदराबाद विश्वविद्यालय, टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ़ सोशल साइंस, एनसीईआरटी सहित भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) जैसे संस्थानों में ऐसा कोई वरिष्ठ शिक्षक उन्हें नहीं मिला या तैयार नहीं हुआ, जो नई शिक्षा नीति पर बात कर सके? प्राइम टाइम शो में किसी महत्वपूर्ण विषय पर किसी वरिष्ठ शिक्षक का शामिल न होना, एंकर की पहचान पर प्रश्नचिन्ह लगाता है. 

पत्रकार की भूमिका सत्ता के पक्ष और विपक्ष दोनों में खड़े होने की और उन्हें एक आइना दिखाने की होती है. पत्रकारिता जल्दी में लिखा गया इतिहास होता है. जब सामाजिक और राजनीतिक शून्यता व्याप्त होती है, तब मीडिया की भूमिका की अहमियत बढ़ जाती है. जब हर कोई एक ही नैरेटिव की बात कटे तो पत्रकार का कर्तव्य होता है कि वह समाज को ध्यान में रखकर समाज की बात करे और समाज को एक नई दिशा दे. पत्रकार का यह कार्य नहीं होता कि यदि तमाम मुर्गे पूर्व दिशा की ओर मुंह करके बांग दे रहे हैं तो खुद को होशियार दिखाने वाला मुर्गा पश्चिम दिशा में मुंह करके बांग देने का स्वांग भरे. पत्रकार का कर्तव्य होता है कि वह विपरीत परिस्थितियों में सच के साथ रहे और वही प्रस्तुत करे.
यदि कुछ समय बाद भारतीय मीडिया का इतिहास लिखा जाएगा तो यह बात अवश्य रेखांकित किया जाएगा कि एनडीटीवी द्वारा प्रस्तुत तमाम खबरों में जहां प्रस्तोता काफी गंभीर होता था और गंभीरतापूर्वक खबरें परोसी जाती थी, वहीं रवीश कुमार द्वारा प्रस्तुत ‘प्राइम टाइम’ शो इस दौर का ‘प्रहसन शो’ था. रवीश कुमार समाचार दर्शकों के बीच परिचित चेहरा हो लेकिन यह सत्य है कि उन्होंने ही प्राइम टाइम में अपने शो को ‘ब्लैक’ किया था. मीडिया शोधकर्ता इस बात की तस्दीक अवश्य करेंगे कि जब भारत में तथाकथित ‘गोदी मीडिया’ का बोलबाला था तब एनडीटीवी के प्राइम टाइम में ख़बरों के नाम पर सिर्फ रंजन ही नहीं परोस रहा था बल्कि एक एंकर भी तमाशा के एक पात्र के रूप में शामिल था. वह एंकर अपने शो में बार-बार ‘हिन्दू-मुस्लिम’ शब्द का इस्तेमाल कर दूसरे समाचार चैनलों पर तंज कसता था, सरकार पर तंज कसता था. संदेश का आदान-प्रदान करने वाले ‘व्हाट्सएप’ नामक एप को अपने शो में ‘व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी’ कहता था और उसकी आड़ में अपनी मन की बात अपनी जुबान से कहता था. एनडीटीवी का वह पत्रकार ठसक के साथ अपना शो तो पेश करता है लेकिन दिल की कसक चेहरे पर साफ़ दिखता था, आँखों में दिखता था.
बहरहाल, ‘जुबां पे सच, दिल में इंडिया’ यानी एनडीटीवी इंडिया का इतिहास भले ही उज्जवल रहा हो और टीवी पत्रकारिता की दुनिया में कई इतिहास का निर्माण किया हो लेकिन इसी के नाम पर स्तरहीन ‘प्राइम टाइम’ शो भी दर्ज किया जायेगा. यह भी याद किया जायेगा कि कैसे एक संवेदनशील पत्रकार, रिपोर्टर और एंकर का चेहरा बदला और लगातार बदलता जा रहा है और सरोकार वाला पत्रकार कैसे प्रहसन प्रस्तुत करता है. ‘गोदी मीडिया’ और ‘व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी’ जैसे शब्दों के जरिये तंत्र पर तंज कसता हो, उसकी भविष्य की पत्रकारिता यात्रा कैसी होगी, इसका अध्ययन आवश्यक है.