5/14/2019

चुनावी संचार रणनीति और वैचारिक वर्ग मॉडल


चुनाव की रणनीति में संचार मॉडल की अहम भूमिका होती है. हर राजनीतिक दल एक-दूसरे पर आक्षेप लगाते हैं, खुद को सबसे बेहतर और दूसरे को नीचा दिखाते हैं. ऐसे में संचार के उस मॉडल को समझना आवश्यक है जिसके तहत चुनावी लड़ाई लड़ी जाती है. सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में चुनावी रणनीति में बड़े-से-बड़े धुरंधर अपना जी-जान लगाते हैं और तमाम रणनीति के साथ तिकड़म भी अपनाते हैं. वोट बैंक की ध्रुवीकरण की रणनीति के अपने मायने होते हैं और कौन नेता किस तरह जनता को अपने पक्ष में करता है और अपने पक्ष में ही वोट डालने के लिए मजबूर करता है, महत्वपूर्ण होता है.

ऐसे में महान संचारविद वैन डीजेक का वैचारिक वर्ग मॉडल काफी मायने रखता है, जिसके तहत करीब एक दशक पहले कहा गया कि मतदाताओं के ध्रुवीकरण के लिए ‘सकारात्मक आत्म-प्रतिनिधित्व’ और ‘नकारात्मक अन्य-प्रतिनिधित्व’ जैसी संकल्पना काफी मायने रखती हैं. जाहिर सी बात है कि वैचारिक वर्ग मॉडल के तहत सैद्धांतिक लड़ाई में ‘स्व’ और ‘अन्य’ का भेदभाव काफी मायने रखता है. चुनावी रैली में ‘स्व’ बनाम ‘अन्य’ का संघर्ष अहमियत रखता है, जिसके तहत वक्ता अपने समूह को अपना और विरोधियों के समूह को बाहरी समूह के तौर पर प्रचारित करता है. वैचारिक वर्ग मॉडल के अनुसार, वक्ता खुद को सकारात्मक तौर पर जनता के सामने पेश करता है, वहीं, प्रतिद्वंद्वी को नकारात्मक तौर पर दिखाता है. इस प्रस्तुतीकरण में वक्ता जहाँ हमेशा अपनी सकारात्मक छवियों को प्रदर्शित करता है, वहीं दूसरी की नकारात्मक छवियों को जनता के सामने जोरदार ढंग से सामने रखता है.
वैन डीजेक ने अपने मॉडल के तहत स्थूल (मैक्रो) विश्लेषण और सूक्ष्म (माइक्रो) विश्लेषण करने की सलाह दी थी. स्थूल विश्लेषण के तहत उनका मानना है कि खुद को उपर और दूसरों को नीचा दिखाने में चार तरह की रणनीति अपनाई जाती है, मसलन खुद की सकारात्मक चीजों पर जोर दें, दूसरों की नकारात्मक चीजों के बारे में लोगों को गहरे तौर पर बताएं, अपने से जुड़ी नकारात्मक बातों को हावी न होने दें और दूसरों की सकारात्मक बातों को भी हावी न होने दें. 
वैचारिक वर्ग मॉडल के तहत वैन डीजेक ने कुल 25 ऐसे बीज तत्वों की चर्चा की है जिसके तहत चुनाव के दौरान संचार की रणनीति अपनाई जाती है. 
मसलन, ‘पहला नेतृत्व का विवरण’, यानी दोनों पक्ष अपने-अपने नेता की बड़ाई और दूसरे पक्ष के नेता की बुराई करता है. दूसरा ‘अथॉरिटी’ यानी ऐसे प्रभावशाली वर्गों के सहायता ली जाती है जो जो उनके दावे का समर्थन करें. ये प्रभावशाली वर्ग कोई संस्थान या व्यक्ति कोई भी हो सकता है और उसे आदर्श के तौर पर समाज में देखा जाता है. इनमें धार्मिक नेता, विशेषज्ञ, अंतर्राष्ट्रीय संस्था, स्कॉलर, मीडिया, अदालत आदि शामिल हैं. तीसरा ‘बोझ’, यानी इसके तहत जनता के सामने यह बात प्रदर्शित की जाती है कि अमुक समूह के कारण देश या समाज को मानवीय या आर्थिक हानि हुई और समूह को निशाना बनाये जाने से लक्षित समूह की भावना को आसानी से प्रभावित किया जा सकता है. चौथा, वर्गीकरण, यानी इसके जरिये राजनीति  दलों और समाज के लोगों ओ अलग-अलग भागों में धार्मिक और राजनीति के आधार पर बांटा जाता है या बंटने के लिए मजबूर किया जाता है. पांचवां, ‘तुलना’ यानी  दो लोग (नामदार और कामदार), समूह, स्थान, वस्तुओं के बीच समानता और अंतर को प्रदर्शित किया जाता है. आतंरिक समूह हमेशा सकारात्मक पहलुओं को लोगों के सामने रखता है, वहीं बाहरी समूह के बारे में नकारात्मक बातों को प्रदर्शित करता है.
वैन डीजैक के अनुसार छठा मामला ‘सर्वसम्मति’ का है और इसके तहत अक्सर एकजुटता और समझौता की स्थापना होती है. इस रणनीति के तहत राष्ट्रीय मुद्दे और बाहरी देशों का डर आम जनता को दिखाया जाता है, जिससे एक खास पक्ष में जनता एकजुट हो. सातवां, ‘प्रति तथ्यात्मक’ यानी इसके तहत लोगों की सुहानुभूति जुटाने का कार्य किया जाता है और खुद को ऐसी स्थिति चाहे अल्पसंख्यक धार्मिक या जाति का नाम पर लोगों को अपने पक्ष में किया जाता है. आठवां, खंडन, जो एक वैचारिक रणनीति है और इसके तहत ‘लेकिन’, ‘अभी तक’ या ‘फिर भी’ जैसे शब्दों का प्रयोग कर खुद की स्वच्छ छवि पेश की जाती है. नौवां, व्यंजना, यानी वक्ता सामान्य शब्दों के बदले अपमानजनक या कठोर शब्दों का प्रयोग करता है. दसवां है गोपनीयता, यानी वक्ता अपनी बात को साबित करने के लिए गोपनीय बातों को भी जनता के सामने प्रदर्शित करता है. अपनी बातों को मनवाने के लिए आंकड़े भी लोगों के सामने रखता है.
वैचारिक वर्ग मॉडल के अनुसार चुनावी रणनीति के तहत चित्रण और उदहारण का भी अपना महत्त्व है. इसके तहत वक्ता अपनी बातों को सही ठहराने के लिए हर तरह के यानी सही या झूठे तथ्यों का सहारा लेता है. बारहवें विन्दु में डीजैक ने कहा है कि सामान्यीकरण भी चुनावी रणनीति का अहम् हिस्सा है और इसके तहत किसी खास व्यक्ति के नकारात्मक के साथ-साथ सकारात्मक पहलुओं के बारे में जनता के सामने चित्रण किया जाता है. तेरहवां मामला अतिश्योक्ति का है, जिसके तहत भाषाई रणनीति अपनाई जाती है और किसी भी बात के अर्थ का अनर्थ ढूंढने का काम किया जाता है. चौदहवां मामला ‘निहितार्थ’ का है. इसके तहत वक्ता किसी ख़ास मुद्दे पर संक्षिप और भ्रामक जानकारी देता है और जिस किसी मामले में उसे लगता है कि वह फंस सकता है, उसी बचता है. पंद्रहवां विन्दु है, विडम्बना, यानी वक्ता उस माइलेज की खोज में रहता है कि उसने क्या कहा और लोगों के किस तरह उसे गलत तरीके से लिया और फिर वह आम जनता की सुहानुभूति भाषा या व्यंग्य के जरिये लेता है. 
संचारविद वैन डीजैक के अनुसार, चुनावी रणनीति में शब्दों के चयन का बड़ा ही महत्त्व है और किसी की नकारात्मक और सकारात्मक छवि बनाने में इसकी अहम् भूमिका होती है. वहीं, रूपक के जरिये वैसी दो घटनाओं या वस्तुओं के तुलना की जाती है, जिसके तुलना नहीं हो सकती है और इसके जरिये जनता को दिग्भ्रमित किया जाता है. राष्ट्रीय महिमामंडन भी चुनावी रणनीति का हिस्सा है और इसके तहत इतिहास, सिद्धांत, संस्कृति और परंपरा की आड़ में जनता को अपने पक्ष में किया जाता है. सामान्य अभिव्यक्ति की भी काफी अहमियत है और इसके जरिये जनता को बताया जाता है क्या करना चाहिए और किया नहीं करना चाहिए. चुनावी लड़ाई में ‘नंबर गेम’ के जरिये संख्या और सांख्यिकी के जरिये अपनी बातों को पुख्ता की जाती है. गौरतलब है कि ‘ध्रुवीकरण’ हर चुनाव में किसी खास पार्टी को जिताने और हराने का काम करती है और यह अपने बारे में सकारात्मक और दुसरे के बारे में नकारात्मक बातों को प्रस्तुत करने के कारण ही जनता के बीच पैदा होती है. लोकलुभावनवाद, पूर्वधारणा, संरक्षण, अस्पष्टता और उत्पीडित दिखाना आदि भी चुनावी रणनीति का हिस्सा होता है.

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